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भक्ति वहां खत्म हो जाती है, जहां हथियार निकल आते हैं – कहां जा रहा है समाज?…

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On: January 29, 2026 9:43 PM
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जमशेदपुर। एक बार फिर समाज की संवेदनशीलता और सोच पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हालिया घटनाक्रम ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम सच में सभ्य समाज की ओर बढ़ रहे हैं या फिर शोर, दिखावे और हिंसा की राह पर भटकते जा रहे हैं। “डीजे की आवाज़ ऊंची हुई और इंसानियत दब गई”—यह पंक्ति आज की सच्चाई को बखूबी बयां करती है।

धार्मिक आयोजनों, जुलूसों और उत्सवों के नाम पर जिस तरह से हथियारों का प्रदर्शन, अश्लील गानों पर नाच और खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, वह न सिर्फ चिंताजनक है बल्कि समाज के नैतिक पतन की ओर भी इशारा करता है। भक्ति, जो आत्मशुद्धि और शांति का मार्ग दिखाती है, आज कहीं न कहीं अहंकार और शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनती जा रही है।

बीते दिनों शहर के कई इलाकों में धार्मिक जुलूसों के दौरान डीजे की तेज आवाज़, भड़काऊ गीत और हथियार लहराने की तस्वीरें सामने आईं। इन घटनाओं ने आम नागरिकों, बुद्धिजीवियों और समाजसेवियों को झकझोर कर रख दिया है। लोगों का कहना है कि जब आस्था के नाम पर डर का माहौल बनाया जाए, तो यह भक्ति नहीं बल्कि उन्माद कहलाता है।

समाज के प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि मां सरस्वती विद्या की देवी हैं। वे ज्ञान, विवेक और सद्बुद्धि देती हैं, न कि चाकू, तलवार और लाठी। “मां सरस्वती विद्या देती हैं, चापड़ और पत्थर नहीं”—यह वाक्य आज के हालात पर करारा तंज बन गया है। सवाल यह है कि क्या हम अपने बच्चों और युवाओं को यही संस्कार दे रहे हैं?

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि डीजे संस्कृति ने सामाजिक सौहार्द को गहरी चोट पहुंचाई है। तेज आवाज़ न सिर्फ बुजुर्गों, मरीजों और छात्रों के लिए परेशानी बनती है, बल्कि कई बार विवाद और हिंसा की वजह भी बन जाती है। जब डीजे की आवाज़ इंसानियत पर भारी पड़ जाए, तो समझ लेना चाहिए कि समाज गलत दिशा में जा रहा है।

प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। कई मामलों में कार्रवाई के बावजूद ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति यह संकेत देती है कि सिर्फ सख्ती नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता भी जरूरी है। कानून अपना काम करेगा, लेकिन समाज को भी आत्ममंथन करना होगा कि हम किस तरह की परंपराओं को बढ़ावा दे रहे हैं।

शिक्षाविदों का कहना है कि शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ डिग्री देना नहीं, बल्कि इंसान बनाना है। अगर पढ़ा-लिखा युवा भी उग्रता और हिंसा का रास्ता अपनाने लगे, तो यह शिक्षा प्रणाली और सामाजिक वातावरण दोनों के लिए खतरे की घंटी है। मां सरस्वती की सच्ची पूजा किताब, कलम और संस्कारों से होती है, न कि शोर और शक्ति प्रदर्शन से।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद शहर में एक वर्ग ऐसा भी है, जो खुलकर इसका विरोध कर रहा है। समाजसेवी संगठनों ने प्रशासन से मांग की है कि धार्मिक आयोजनों के लिए सख्त गाइडलाइन बने, डीजे की आवाज़ पर नियंत्रण हो और हथियारों के प्रदर्शन पर बिना किसी भेदभाव के कठोर कार्रवाई की जाए।

आज जरूरत है आत्मचिंतन की। यह समझने की कि भक्ति का मतलब शांति है, सह-अस्तित्व है और इंसानियत है। अगर भक्ति के नाम पर भय पैदा हो, तो वह भक्ति नहीं, विकृति बन जाती है। कहना गलत नहीं होगा कि अगर अब भी समाज नहीं संभला, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। मां सरस्वती से यही प्रार्थना है इन्हें सद्बुद्धि दीजिए, ताकि ज्ञान की देवी का नाम लेकर अज्ञान और हिंसा का महिमामंडन न हो

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