तुलसी भवन में धर्म रक्षा दिवस का आयोजन
जमशेदपुर। विश्व हिंदू परिषद धर्म प्रसार की जमशेदपुर टोली द्वारा तुलसी भवन में घर वापसी आंदोलन के प्रणेता स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती जी के बलिदान दिवस को धर्म रक्षा दिवस के रूप में श्रद्धा और संकल्प के साथ मनाया गया। इस अवसर पर वर्तमान समय में समाज के लिए गंभीर चुनौती बन चुके धर्मांतरण के मुद्दे को सशक्त और प्रभावी ढंग से उठाया गया।

कार्यक्रम का नेतृत्व विश्व हिंदू परिषद के जिला प्रमुख ठाकुर विवेक सिंह ने किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती का बलिदान केवल इतिहास नहीं, बल्कि आज भी समाज को जागृत करने वाला संदेश है। उन्होंने धर्म रक्षा और सांस्कृतिक चेतना को समय की आवश्यकता बताया।
संतों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न पंथों की रही सहभागिता
इस कार्यक्रम में क्षेत्र प्रमुख उपेन्द्र जी कुशवाहा, प्रांत प्रमुख संजय चौरसिया, प्रांत परियोजना प्रमुख राजू चौधरी, प्रांत टोली सदस्य एम. पद्मजा सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। कार्यक्रम को संत समाज की गरिमामयी उपस्थिति ने विशेष स्वरूप प्रदान किया, जिनमें स्वामी सोमेश्वरानंद जी महाराज, महामण्डलेश्वर किन्नर अखाड़ा साध्वी अमरजीत नंद गिरी, अघोरी अजय कर्मकार प्रमुख रूप से शामिल रहे।

सर्वसमाज की एकजुटता का संदेश
कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि इसमें विभिन्न समाजों और संगठनों ने सहभागिता कर सामाजिक समरसता का संदेश दिया। सिख समाज से चंचल भाटिया, रंगरेटा समाज से मनजीत सिंह एवं किरणदीप, धर्म जागरण समन्वय से सुदर्शनपति व रमण चौधरी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से रवीन्द्र जी, सनातन युवा मंच की वंदना अलोगी, बजरंग दल से मुन्ना दूबे तथा सरना समाज से सन्नी उरांव सहित सनातन समाज के लगभग सभी पंथों एवं अंगों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
घर वापसी के अनुभवों ने छोड़ा गहरा प्रभाव
कार्यक्रम के दौरान घर वापसी कर चुके लोगों ने मंच से अपने जीवन अनुभव और आपबीती साझा की, जिसे उपस्थित जनसमूह ने गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ सुना। इन अनुभवों ने धर्म, संस्कृति और पहचान के महत्व को और अधिक स्पष्ट किया।

सफल आयोजन में रही टीमवर्क की अहम भूमिका
कार्यक्रम को सफल और प्रभावशाली बनाने में धर्म प्रसार के जिला अधिकारी हरिद्वार जी, श्याम सुंदर मिश्रा, संजय पांडे, उमा महेश्वर, दिलीप, रंजन, रवीन्द्र एवं अखिलेश की सराहनीय भूमिका रही।
धर्म रक्षा दिवस का यह आयोजन न केवल स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती के बलिदान को स्मरण करने का अवसर बना, बल्कि समाज को धर्मांतरण जैसे संवेदनशील विषय पर जागरूक और संगठित करने का मजबूत संदेश भी दे गया। कार्यक्रम ने यह स्पष्ट किया कि जब समाज एकजुट होता है, तब धर्म और संस्कृति की रक्षा और भी सशक्त रूप से संभव होती है।















