नई दिल्ली:भारत को खाद्यान्न संकट से उबारकर आत्मनिर्भर बनाने वाले महान व्यक्तित्व चिदंबरम सुब्रमण्यम को इतिहास में भारत की हरित क्रांति के वास्तुकार के रूप में जाना जाता है। वे ऐसे दूरदर्शी नेता थे, जिन्होंने कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव किए, लेकिन कभी अपने योगदान का श्रेय स्वयं नहीं लिया।
चिदंबरम सुब्रमण्यम एक वरिष्ठ राजनेता, स्वतंत्रता सेनानी और भारत सरकार में पूर्व केंद्रीय खाद्य एवं कृषि मंत्री रहे। उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और बाद में कानून की पढ़ाई की। युवावस्था में ही वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए और महात्मा गांधी के विचारों से गहराई से प्रभावित हुए। सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा।
स्वतंत्रता के बाद राजनीति में अहम भूमिका
स्वतंत्रता के बाद सुब्रमण्यम ने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। वे तमिलनाडु विधानसभा के सदस्य बने और राज्य सरकार में शिक्षा एवं वित्त मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे। वर्ष 1962 में वे लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए और केंद्र सरकार में इस्पात एवं खान, परिवहन, योजना, रक्षा तथा कृषि जैसे अहम मंत्रालयों का नेतृत्व किया।
हरित क्रांति का सूत्रधार
1960 के दशक में जब भारत गंभीर खाद्यान्न संकट और आयात पर निर्भरता से जूझ रहा था, उस समय कृषि मंत्री के रूप में सी. सुब्रमण्यम ने साहसिक और दूरगामी नीतिगत फैसले लिए। उनके नेतृत्व में उच्च उपज देने वाली किस्मों (HYV) के बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और सुनिश्चित सिंचाई व्यवस्था को बढ़ावा दिया गया।
उन्होंने प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक एम. एस. स्वामीनाथन के साथ मिलकर यह सुनिश्चित किया कि वैज्ञानिक शोध सीधे किसानों तक पहुंचे। शुरुआत में यह क्रांति गेहूं उत्पादन पर केंद्रित रही, खासकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में। इसके परिणामस्वरूप एक दशक के भीतर भारत के खाद्यान्न उत्पादन में ऐतिहासिक वृद्धि हुई।
खाद्य आत्मनिर्भरता की नींव
हरित क्रांति के चलते भारत ने PL-480 खाद्य आयात पर निर्भरता कम की और खाद्य आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाया। बफर स्टॉक प्रणाली और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जैसे तंत्रों ने न केवल किसानों की आय को स्थिर किया, बल्कि उपभोक्ताओं को भी महंगाई से राहत दी। इन सुधारों ने भारत की दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा की मजबूत नींव रखी।
अन्य क्षेत्रों में भी योगदान
कृषि के अलावा चिदंबरम सुब्रमण्यम ने शिक्षा, औद्योगीकरण और रक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्होंने तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कई आईआईटी एवं इंजीनियरिंग संस्थानों की स्थापना में सहयोग किया। रक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।
सम्मान और विरासत
देश के लिए उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए वर्ष 1998 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। आज भी कई कृषि संस्थान और पुरस्कार उनके नाम पर स्थापित हैं।
7 नवंबर 2000 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है। भारत का विश्व में चावल और गेहूं का प्रमुख उत्पादक देश बनना, उनकी दूरदर्शिता और नीतियों का प्रत्यक्ष परिणाम है।
प्रेरणा का स्रोत
चिदंबरम सुब्रमण्यम का जीवन इस बात का उदाहरण है कि साहस, दृढ़ संकल्प और राष्ट्रहित के प्रति निष्ठा से असंभव दिखने वाले लक्ष्य भी प्राप्त किए जा सकते हैं। वे निस्संदेह आधुनिक भारत के निर्माताओं में से एक थे और आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा बने रहेंगे।











