जमशेदपुर (गोलमुरी): गोलमुरी क्षेत्र से एक बार फिर सरकारी व्यवस्था की सुस्त कार्यप्रणाली और जानकारी के अभाव में जूझ रहे दिव्यांग नागरिकों की पीड़ा सामने आई है। गोलमुरी लोको कॉलोनी, राम मंदिर के सामने रहने वाले 23 वर्षीय सन्नी मुखी, पिता राम मुखी, बचपन से ही दिव्यांग हैं, लेकिन तमाम वर्षों के बाद भी उनका दिव्यांगता प्रमाण पत्र अब तक नहीं बन पाया है।
यह गंभीर मामला तब सामने आया जब “नील-दीप नि:शक्त सेवा अभियान” के संचालक एवं पोटका के पूर्व जिला पार्षद करुणा मय मंडल को दूरभाष पर इसकी सूचना प्राप्त हुई। सूचना मिलते ही श्री मंडल ने मामले को गंभीरता से लेते हुए सन्नी मुखी के परिवार से संपर्क किया और हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया।
5 जनवरी को सदर अस्पताल में जांच कर प्रमाण पत्र बनवाने का आश्वासन
पूर्व जिला पार्षद करुणा मय मंडल ने बताया कि सन्नी मुखी के पिता राम मुखी, जो स्वयं पूर्ण रूप से हाथ के सहारे चलने को विवश हैं, अपने बेटे के इलाज और दस्तावेजों के लिए वर्षों से भटक रहे हैं। इसे देखते हुए उन्होंने 5 जनवरी को सदर अस्पताल में लगने वाले शिविर में सन्नी मुखी को ले जाकर शारीरिक जांच करवाने और दिव्यांगता प्रमाण पत्र बनवाने का स्पष्ट आश्वासन दिया है।
पहले भी सामने आ चुकी हैं ऐसी समस्याएं
गौरतलब है कि कुछ दिन पूर्व भी इसी तरह की सूचना मिलने पर श्री मंडल केबुल हरिजन बस्ती, गोलमुरी में रहने वाले एक अन्य दिव्यांग युवक सागर मुखी से मिलने उनके आवास पहुंचे थे। सागर मुखी को चलने-फिरने में भारी कठिनाई है और उन्हें ई-ट्राई साइकिल की अत्यंत आवश्यकता बताई गई थी, जिसे लेकर भी प्रयास जारी हैं।
जानकारी और सरकारी पहुंच के अभाव में जूझ रहे लोग
स्थानीय लोगों के अनुसार गोलमुरी और आसपास की बस्तियों में ऐसे कई दिव्यांग नागरिक हैं, जो या तो जानकारी के अभाव में या फिर सरकारी तंत्र की सीधी पहुंच न होने के कारण अपने अधिकारों से वंचित रह जाते हैं। न तो समय पर प्रमाण पत्र बन पाता है और न ही उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिल पाता है।
उपायुक्त से विशेष ध्यान देने की अपील
पूर्व जिला पार्षद करुणा मय मंडल ने समाज सेवा में विशेष रुचि रखने वाले वर्तमान जिला उपायुक्त से आग्रह किया है कि गोलमुरी सहित इन बस्तियों पर विशेष ध्यान दिया जाए, ताकि जरूरतमंद दिव्यांग नागरिकों को समय पर प्रमाण पत्र, सहायक उपकरण और सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके।
यह मामला न केवल एक परिवार की पीड़ा को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर जागरूकता और प्रशासनिक सक्रियता बढ़ाने की कितनी आवश्यकता है, ताकि समाज के सबसे कमजोर वर्ग को उनका हक समय पर मिल सके।










