जमशेदपुर : शहर के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में शामिल मोतिलाल नेहरू पब्लिक स्कूल में शिक्षकों के लिए एक विशेष प्रशिक्षण सत्र का आयोजन किया गया। यह सत्र “Understanding and Management of Learning Disabilities” विषय पर केंद्रित था, जिसमें शिक्षकों को विद्यार्थियों में पाई जाने वाली विभिन्न सीखने संबंधी कठिनाइयों को समझने और उन्हें प्रभावी ढंग से संभालने के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य शिक्षकों को समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) के महत्व से अवगत कराना और उन्हें ऐसे विद्यार्थियों की सहायता करने के लिए व्यावहारिक रणनीतियाँ प्रदान करना था, जो सीखने में विशेष चुनौतियों का सामना करते हैं।
इस महत्वपूर्ण प्रशिक्षण सत्र का संचालन प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉ. सौभाग्य एल. दत्त ने किया। उन्होंने अपने अनुभव और विशेषज्ञता के आधार पर शिक्षकों को यह समझाया कि कक्षा में विभिन्न प्रकार के विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता अलग-अलग होती है और ऐसे में शिक्षकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने बताया कि शिक्षक यदि सही समय पर बच्चों की सीखने से जुड़ी कठिनाइयों को पहचान लें, तो उन्हें उचित मार्गदर्शन देकर उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया जा सकता है और उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है।
डॉ. दत्त ने सत्र के दौरान सबसे पहले समावेशी शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज के समय में शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं है, बल्कि हर बच्चे को उसकी क्षमता के अनुसार सीखने का अवसर देना भी है। कई बच्चे ऐसे होते हैं जिन्हें पढ़ने, लिखने या गणित समझने में सामान्य से अधिक कठिनाई होती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उनमें प्रतिभा की कमी है। सही मार्गदर्शन और सहयोग मिलने पर ऐसे बच्चे भी उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकते हैं।
सत्र के दौरान उन्होंने विशेष रूप से CWSN (Children With Special Needs) यानी विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों के बारे में विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि ऐसे बच्चों को समझने के लिए शिक्षकों को संवेदनशील और धैर्यवान होना चाहिए। यदि शिक्षक इन बच्चों की समस्याओं को पहचानकर उन्हें सही तरीके से सहयोग दें, तो वे भी आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकते हैं।
डॉ. दत्त ने शिक्षकों को ADHD (Attention Deficit Hyperactivity Disorder) के बारे में भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कई बार कक्षा में कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जो पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते, बार-बार अपनी सीट से उठ जाते हैं, बेचैनी महसूस करते हैं या अपने कार्य को समय पर पूरा नहीं कर पाते। ऐसे लक्षण कई बार ADHD के संकेत हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि ऐसे विद्यार्थियों को डांटने या सज़ा देने के बजाय उन्हें समझने की जरूरत होती है। शिक्षकों को चाहिए कि वे ऐसे बच्चों के लिए पढ़ाई को छोटे-छोटे चरणों में विभाजित करें, उन्हें नियमित रूप से प्रोत्साहित करें और सकारात्मक वातावरण प्रदान करें। उन्होंने सुझाव दिया कि कक्षा में संरचित दिनचर्या (Structured Routine), छोटे-छोटे कार्य, सकारात्मक प्रतिक्रिया और निरंतर प्रोत्साहन जैसी रणनीतियाँ अपनाकर ऐसे विद्यार्थियों की मदद की जा सकती है।
इस प्रशिक्षण सत्र के दौरान डॉ. दत्त ने विभिन्न प्रकार की लर्निंग डिसएबिलिटी (Learning Disabilities) के बारे में भी विस्तार से बताया और उनके समाधान के लिए व्यावहारिक उपाय सुझाए।
उन्होंने डिस्लेक्सिया (Dyslexia) के बारे में बताते हुए कहा कि यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें बच्चों को शब्दों को पढ़ने और समझने में कठिनाई होती है। कई बार ऐसे बच्चे अक्षरों को उल्टा पढ़ लेते हैं या शब्दों को सही तरीके से पहचान नहीं पाते। उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसे बच्चों को पढ़ाने के लिए फॉनिक्स आधारित पढ़ाई (Phonics-Based Reading) और दृश्य सामग्री (Visual Aids) का उपयोग किया जाना चाहिए, जिससे उन्हें शब्दों को समझने में आसानी हो सके।
इसके बाद उन्होंने डिस्ग्राफिया (Dysgraphia) के बारे में जानकारी दी। इस स्थिति में बच्चों को लिखने और सही वर्तनी (Spelling) करने में कठिनाई होती है। ऐसे विद्यार्थियों को बार-बार लिखने का अभ्यास कराया जाना चाहिए और उन्हें अपनी बात मौखिक रूप से व्यक्त करने का अवसर भी दिया जाना चाहिए। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे धीरे-धीरे लिखने में सुधार कर पाते हैं।
उन्होंने डिस्कैल्कुलिया (Dyscalculia) का भी उल्लेख किया, जिसमें बच्चों को संख्याओं और गणितीय अवधारणाओं को समझने में कठिनाई होती है। डॉ. दत्त ने सुझाव दिया कि ऐसे विद्यार्थियों को गणित पढ़ाते समय चित्रों, चार्ट और अन्य दृश्य माध्यमों का उपयोग किया जाना चाहिए। साथ ही उन्हें चरणबद्ध तरीके से पढ़ाया जाए ताकि वे धीरे-धीरे गणितीय अवधारणाओं को समझ सकें।
इसके अलावा उन्होंने डिस्प्रैक्सिया (Dyspraxia) के बारे में भी चर्चा की, जो मोटर स्किल्स और समन्वय (Coordination) से जुड़ी समस्या है। ऐसे बच्चों को शारीरिक गतिविधियों या लेखन कार्यों में कठिनाई हो सकती है। उन्होंने कहा कि ऐसे विद्यार्थियों को स्पष्ट निर्देश दिए जाने चाहिए और उन्हें कार्य पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय दिया जाना चाहिए।
सत्र के दौरान शिक्षकों ने भी सक्रिय रूप से भाग लिया और कई महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे। डॉ. दत्त ने सभी प्रश्नों के उत्तर देते हुए शिक्षकों को व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि कक्षा में ऐसे विद्यार्थियों की पहचान कैसे की जा सकती है और उन्हें किस प्रकार सहायता प्रदान की जा सकती है।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं था, बल्कि शिक्षकों को यह एहसास कराना भी था कि हर बच्चा अलग होता है और उसे उसी के अनुसार सीखने का अवसर मिलना चाहिए। जब शिक्षक बच्चों की जरूरतों को समझते हैं और उनके अनुसार शिक्षण पद्धति अपनाते हैं, तो शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य पूरा होता है।
कार्यक्रम के अंत में विद्यालय की प्राचार्या श्रीमती संगीता सिंह ने डॉ. सौभाग्य एल. दत्त का धन्यवाद करते हुए कहा कि यह प्रशिक्षण सत्र शिक्षकों के लिए अत्यंत उपयोगी और प्रेरणादायक रहा। उन्होंने कहा कि इस सत्र के माध्यम से शिक्षकों को समावेशी शिक्षा के महत्व को समझने और विशेष आवश्यकताओं वाले विद्यार्थियों की सहायता करने के लिए नई दृष्टि और व्यावहारिक सुझाव प्राप्त हुए हैं।
प्राचार्या ने यह भी कहा कि मोतिलाल नेहरू पब्लिक स्कूल हमेशा से ही विद्यार्थियों के समग्र विकास पर जोर देता रहा है। विद्यालय का प्रयास है कि हर बच्चे को उसकी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर मिले और कोई भी विद्यार्थी शिक्षा से वंचित न रह जाए।
उन्होंने डॉ. दत्त द्वारा साझा किए गए ज्ञान और अनुभव के लिए आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम शिक्षकों को और अधिक सक्षम बनाते हैं। जब शिक्षक नए विचारों और आधुनिक शिक्षण तकनीकों से परिचित होते हैं, तो वे विद्यार्थियों को बेहतर तरीके से मार्गदर्शन दे पाते हैं।
कार्यक्रम का समापन सकारात्मक वातावरण में हुआ और सभी शिक्षकों ने इस प्रशिक्षण को अत्यंत लाभदायक बताया। उन्होंने कहा कि इस सत्र से उन्हें कक्षा में विद्यार्थियों की विविध आवश्यकताओं को समझने और उन्हें सही तरीके से सहयोग देने की नई प्रेरणा मिली है।
इस प्रकार मोतिलाल नेहरू पब्लिक स्कूल द्वारा आयोजित यह प्रशिक्षण सत्र न केवल शिक्षकों के लिए ज्ञानवर्धक साबित हुआ, बल्कि समावेशी और संवेदनशील शिक्षा व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी माना जा रहा है। विद्यालय का यह प्रयास यह दर्शाता है कि शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य हर बच्चे के भीतर छिपी क्षमता को पहचानना और उसे विकसित करना भी है।









