तलाक — एक ऐसा शब्द जिसे पढ़ना आसान, पर झेलना असहनीय होता है। वरिष्ठ पत्रकार और प्रख्यात स्तंभकार श्री निशिकांत ठाकुर जी ने इस विषय पर जो विचार रखे हैं, वह केवल लेखन नहीं, बल्कि टूटे हुए दिलों की अनकही पीड़ा की स्याही से लिखा गया एक अनुभव है।
श्रद्धांजलि स्वरूप सम्मान के शब्द — निशिकांत ठाकुर जी को समर्पित
उनके शब्दों में संवेदना है, समाज को आइना दिखाने वाली बेबाकी है, और सबसे बड़ी बात — उस दर्द की गहराई है जो सिर्फ एक भुक्तभोगी ही महसूस कर सकता है। उन्होंने तलाक जैसे सामाजिक और भावनात्मक विषय को न केवल निर्भीकता से उठाया, बल्कि उसकी तहों में छिपी मानसिक टूटन, सामाजिक असहायता और व्यक्तिगत अकेलेपन को भी उजागर किया।
शब्दों के पार देखने की जो दृष्टि निशिकांत जी के पास है, वह पत्रकारिता को मानवीय बना देती है — सिर्फ खबर नहीं, इंसानी कहानी कहती है। उनकी लेखनी उन असंख्य व्यक्तियों की आवाज बनती है जो रिश्तों की दरकन के बीच चुप रह जाते हैं।
हम उनके लेखन को एक संवेदनशील दस्तावेज मानते हैं — जहाँ हर वाक्य एक टूटी उम्मीद की चीख है और हर विराम एक ठहरी हुई सांस।
नमन है ऐसे लेखक को,
जिन्होंने समाज के सबसे संवेदनशील मोड़ों पर कलम चलाई — दर्द के स्याह अंधेरों में भी सच्चाई की मशाल लेकर।
सादर श्रद्धा और सम्मान सहित, उनके लेख को समझते है –
“तलाक” (वैवाहिक विच्छेद) एक ऐसा शब्द है जिसका दर्द और पीड़ा केवल वही समझ सकता है जिसने ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का सामना किया हो। यह एक ऐसी स्थिति है जो किसी भी परिवार को अंदर तक हिला देती है। इसके बारे में सोचने की बजाय, ऐसे जोड़े पुलिस और अदालत का चक्कर लगाकर अपनी खुशहाल ज़िंदगी खत्म कर लेते हैं।
ज़िंदगी वाकई मुश्किलों और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से भरी है, 99 प्रतिशत जोड़े इसे पार करने में कामयाब हो जाते हैं, लेकिन 1 प्रतिशत जोड़े ऐसे भी होते हैं जो इन मुश्किल रास्तों पर चल नहीं पाते। कुछ पीछे छूट जाते हैं और अपनी ज़िंदगी नर्क बना लेते हैं। दुनिया में कई जगहों पर इस बात पर शोध हो रहा है कि ऐसा क्यों होता है, बड़ी-बड़ी स्वयंसेवी संस्थाएँ इस दुर्भाग्यपूर्ण मामले को सुलझाने और समाधान ढूँढने में लगी हैं। कुछ तो सुलझ जाती हैं, लेकिन कुछ अनसुलझे ही रह जाते हैं। हालाँकि ऐसी बुराइयों को दूर करने के लिए कुछ समाजसेवी संस्थाएँ हैं, लेकिन जब उनसे विवाद नहीं सुलझता, तो हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ता है।
तलाक क्यों होते हैं? जब इस विषय पर शोध किया गया तो मूलतः यह पाया गया कि प्रतिबद्धता की कमी, बेवफाई, अत्यधिक संघर्ष और बहस, शारीरिक अंतरंगता की कमी, आर्थिक समस्याएँ और नशे की लत। इसके अलावा, आपसी समझ की कमी, संवाद की कमी, एक-दूसरे के प्रति सम्मान की कमी भी तलाक के कारण बन सकते हैं।
अध्ययन में सामने आए कई अन्य कारणों में प्रतिबद्धता की कमी, जब उनमें दरार आ जाती है जैसे शादी के बाद पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति बेवफा हो जाते हैं। चाहे वह शारीरिक हो या भावनात्मक, रिश्ते में अविश्वास पैदा होने लगता है। लगातार झगड़े और बहस, जब पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध, आर्थिक मतभेद मुख्य कारण बन जाते हैं, नशे की लत, आपसी तालमेल, मानसिक और शारीरिक शोषण आदि कई अन्य कारण हैं जो अलग-अलग महिलाओं और पुरुषों से बात करने पर सामने आते रहते हैं।
गौरतलब है कि हर तलाक के पीछे अलग-अलग कारण होते हैं। ऐसे मुद्दे भी होते हैं जो घर से बाहर नहीं आ पाते और रिश्ता (तलाक) हो जाता है, परिवार टूट जाता है।
अगर हम हर मुद्दे की व्याख्या करें तो यह शोध का विषय बन जाएगा। लेकिन एक बात जो आम तौर पर देखने को मिलती है, वह यह कि कई जगहों पर पुरुष अपने पुरुषत्व के कारण अत्याचारी बन जाते हैं, जबकि कई मामलों में महिलाएँ कानूनी प्रक्रिया की मानसिकता अपनाकर उसका फ़ायदा उठाने की कोशिश करती हैं। स्थिति ऐसी हो जाती है कि किसी भी पक्ष का हस्तक्षेप आग में घी डालने जैसा काम करता है। फिर ऐसी स्थिति में हस्तक्षेप करके समस्या का समाधान कैसे किया जाए।
ऐसा नहीं है कि इस प्रकार की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति समाज के किसी एक वर्ग में ही होती है, आज समाज का हर वर्ग इसमें उलझा हुआ है। तलाक न केवल परिवार को तोड़ता है, बल्कि समाज इस मुद्दे पर चर्चा करके इसे और विषाक्त बना देता है। जिन लोगों ने यह पीड़ा झेली है, वे समाज में अलोकप्रिय और उपहास के पात्र बन जाते हैं और समाज उन्हें ताने मारता है और उन्हें छोड़ने या कुछ बुरा करने के लिए मजबूर करता है। आज यह दुनिया की प्रमुख समस्याओं में से एक है और इसका समाधान खोजने के लिए दुनिया में बड़े पैमाने पर शोध हो रहे हैं।
कई शोधकर्ताओं का यह भी कहना है कि समाज के कुछ विशेष वर्ग अपने काम में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उनके पति-पत्नी का रिश्ता लगभग न के बराबर हो जाता है, वे अपने काम में इतना व्यस्त हो जाते हैं कि एक-दूसरे को जान ही नहीं पाते, रिश्ता दिन-ब-दिन कमजोर होने लगता है। फिर नौबत तलाक तक पहुंच जाती है। कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि किसी एक सदस्य की लत के कारण जीवन दूभर हो जाता है और फिर परिवार तलाक के लिए मजबूर हो जाता है।
कुछ शोधकर्ताओं ने अपने शोध में माना है कि किसी तीसरे पक्ष, चाहे वह महिला हो या पुरुष, की मौजूदगी के कारण रोजाना झगड़े की स्थिति पैदा होने लगती है और अंत में बात तलाक तक पहुंच जाती है। कई जगहों पर यह भी पाया गया है कि आर्थिक स्थिति भी तलाक का कारण बनती है। यहां आर्थिक स्थिति का मतलब कमजोर होना नहीं है, तलाक आर्थिक रूप से संपन्न होने और अन्य दोनों कारणों से होता है।
कुल मिलाकर यह कोई परंपरा नहीं है बल्कि आधुनिक शिक्षित समाज में ऐसा ज्यादा होने लगा है। लेकिन यह भी सच है कि प्राचीन काल से ही महिलाओं का अपमान किया जाता रहा है। इसके साथ ही यह तर्क भी दिया जाता रहा है कि पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को पुरुषों के बराबर होने का अधिकार नहीं है।
अब दुनिया की महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि वे किसी भी तरह से पुरुषों से पीछे नहीं हैं, लेकिन पुरुष प्रधान मानसिकता को बदलने में अभी भी समय लग रहा है और महिलाओं पर अत्याचार अभी भी जारी हैं।
आखिरकार, यह जटिल प्रश्न जो अभी भी उलझा हुआ है, वह यह है कि समाज के इन टूटते रिश्तों को कैसे सुलझाया जाए?
अमेरिकी विश्वविद्यालय की रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2100 तक विश्व की जनसंख्या आधी रह जाएगी और भारत की जनसंख्या केवल 100 करोड़ रह जाएगी।
स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के शोध में तलाक का एक बड़ा मुद्दा भी सामने आया है जिसमें कहा गया है कि पारिवारिक रिश्तों के टूटने और खासकर पति-पत्नी के बीच तलाक के कारण बच्चों के जन्म पर दुनिया पर असर पड़ेगा और जनसंख्या दिन-ब-दिन गिरती रहेगी। शोधकर्ताओं ने कई देशों का उदाहरण देते हुए जिसके कारण बच्चों की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से उन पर थी, लेकिन अब माता-पिता को बच्चों के पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी खुद उठानी पड़ रही है, लेकिन ऐसे में अगर तलाक हो जाए, तो बच्चे का पालन-पोषण कौन करेगा?
इन सभी मुद्दों पर विचार करते हुए, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पीएस नरसिम्हा और अतुल एस चांदुरकर की पीठ ने तलाक के मामले में दंपत्ति से कहा कि उन्हें अपने आपसी विवाद को सौहार्दपूर्ण तरीके से सुलझा लेना चाहिए। पीठ ने कहा कि बदले की भावना से जीवन न जिएं क्योंकि आगे लंबी ज़िंदगी है।
आपको एक अच्छा जीवन जीना चाहिए। अदालत की यह सलाह आज के समाज में दोनों पक्षों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और भविष्य में किसी भी वैवाहिक जीवन को खुशहाल बनाए रखने के लिए एक बड़ी सीख है, जो एक मिसाल बन सकती है।
मेरी कामना है कि इसका प्रभाव खासकर युवाओं के लिए अपने जीवन को खुशहाल बनाने का एक आदर्श वाक्य बने। समाज को उम्मीद करनी चाहिए कि इससे समाज का टूटना और रिश्तों का बिखराव रुक सकता है।
- निशिकांत ठाकुर
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)









