जमशेदपुर | समाज के दर्द को शब्दों में पिरोती एक संवेदनशील रचना हाल के दिनों में चर्चा का विषय बनी है। पोटका के पूर्व जिला पार्षद करुणामय मंडल द्वारा रचित यह कविता केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों का स्पष्ट संदेश है।
कविता पढ़ें :
“दुःख तकलीफें है
हजारों अपना।
पर अपने लिए भी
कब तक रोना।।
गर अपना तकलीफें
है भूल जाना।
दूसरों की तकलीफें
रू-बू-रू होना।
समझ गया अगर
दूसरों के दर्द।
पार किया समझो
दर्द के शरहद।।
देखो दुनिया में
कितने गम है।
अपना गम तो
सब से कम है।।
खड़े रहो साथ में
जब तक दम है।
अपना दर्द का
अचूक मरहम है।।”
– करुणामय मंडल
पूर्व जिला पार्षद पोटका
पूर्वी सिंहभूम झारखंड
9693623151
कविता का भावार्थ
कवि कहते हैं कि जीवन में हर व्यक्ति के अपने-अपने दुःख और परेशानियाँ होती हैं। दुखों की संख्या हजारों हो सकती है, लेकिन केवल अपने लिए कब तक रोया जाए? यदि हम अपने दुःख को कुछ देर के लिए भूलकर दूसरों के कष्ट को सामने से देखने और समझने का साहस करें, तो वही क्षण हमें सच्ची मानवता की ओर ले जाता है।
कविता यह संदेश देती है कि
- जब हम दूसरों के दर्द को समझ लेते हैं,
- तब हम अपने व्यक्तिगत दुःख की सीमाओं को पार कर जाते हैं।
दुनिया में असंख्य लोग गंभीर पीड़ाओं से जूझ रहे हैं, ऐसे में हमारा दुःख कई बार उनसे छोटा प्रतीत होता है। कवि आग्रह करते हैं कि जब तक जीवन में शक्ति और सांस है, तब तक दूसरों के साथ खड़े रहना चाहिए—क्योंकि यही सेवा, यही संवेदना हमारे अपने दर्द की सबसे कारगर दवा बन जाती है।
विश्लेषण: कविता नहीं, सामाजिक दर्शन
यह रचना केवल आत्मचिंतन नहीं, बल्कि सामाजिक दर्शन प्रस्तुत करती है। इसमें तीन प्रमुख संदेश उभरकर सामने आते हैं—
- व्यक्तिवाद से समाजवाद की ओर: कविता व्यक्ति को अपने दुःख के दायरे से बाहर निकालकर समाज के व्यापक दुखों से जोड़ती है। यह सोच आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक है।
- संवेदना को शक्ति के रूप में देखना: आमतौर पर दर्द को कमजोरी माना जाता है, लेकिन यहां दूसरों के दर्द को समझना आत्मिक मजबूती और मानसिक परिपक्वता का प्रतीक बताया गया है।
- सेवा ही समाधान है: कवि का मानना है कि दूसरों के साथ खड़ा होना, उनका सहारा बनना ही जीवन के कष्टों का स्थायी उपचार है—यह विचार समाज सेवा की भावना को मजबूत करता है।
समाज से सीधा संवाद
17 दिसंबर 2025 की रात 03:02 मिनट पर लिखी गई यह रचना उस समय आई है, जब समाज में संवेदनहीनता, अकेलापन और संघर्ष बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में करुणामय मंडल की यह कविता सामाजिक दायित्व, मानवीय करुणा और सामूहिक सह-अस्तित्व का स्पष्ट आह्वान करती है।
यह कविता हमें यह सिखाती है कि
दूसरों के दुःख में साथ खड़ा होना ही, अपने जीवन के दुःखों से उबरने का सबसे बड़ा उपाय है।
आज के दौर में, जब समाज को केवल योजनाओं नहीं बल्कि संवेदनशील सोच की आवश्यकता है, यह रचना एक सशक्त सामाजिक संदेश के रूप में सामने आती है।









