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हिंदी में चिकित्सा की शिक्षा- सांप्रदायिक और भगवाकरण। हिन्दी भाषा में एमबीबीएस की शुरुआत पर एआईडीएसओ के महासचिव ने दिया बड़ा बयान।

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Jamshedpur : शुक्रवार 21 अक्टूबर, 2022

एमबीबीएस के लिए हिंदी भाषा में पाठ्य पुस्तकें शुरू करने के मध्य प्रदेश सरकार के फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए, एआईडीएसओ के महासचिव सौरव घोष ने प्रेस के माध्यम से बयान जारी करते हुए विरोध जताया है। इस विरोध में उन्होंने निम्नलिखित बाते कहीं हैं: – 

“केंद्र सरकार एमबीबीएस पाठ्यक्रम में हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को सीखने के माध्यम के रूप में पेश करने के लिए पूरी तरह तैयार है। मध्य प्रदेश में केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह की उपस्थिति में भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम में एमबीबीएस की पुस्तकें हिन्दी में प्रकाशित कर इसकी शुरुआत की जा चुकी है। सरकार इस कदम को यह दावा करके मान्य करने की कोशिश कर रही है कि इससे छात्रों को मदद मिलेगी।”

लेकिन हमारे विचार से चिकित्सा विज्ञान को उसके उच्चतम स्तर तक पढ़ना और समझना बहुत आवश्यक है। और हमारे देश में अंग्रेजी के अलावा किसी अन्य भाषा में चिकित्सा विज्ञान का व्यापक ज्ञान प्राप्त करना संभव नहीं है, क्योंकि दुनिया भर में अध्ययन की जाने वाली अधिकांश आधिकारिक पुस्तकें, जिनमें चिकित्सा विज्ञान में अग्रणी शोध, आविष्कार और खोज शामिल हैं, अंग्रेजी में लिखी गई हैं और अधिकांश शब्दावली अंग्रेजी और लैटिन में हैं। यहां तक ​​कि उन सामग्रियों का मानकीकृत अनुवाद आज तक हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध नहीं है। इसलिए, चिकित्सा विज्ञान को हिंदी या किसी भी क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाना लगभग असंभव है। इसके अलावा, यह कदम अंततः छात्रों के दो वर्गों का निर्माण करेगा – एक खंड, अंग्रेजी में पढ़ रहा है, उच्च शिक्षा के लिए आगे बढ़ेगा, और दूसरा खंड, जो हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़ रहा है, उच्च शिक्षा के लिए नहीं जा पाएगा, या उस मामले में, उनके क्षेत्र का व्यापक ज्ञान प्राप्त करने के लिए उनके मार्ग में बाधा उत्पन्न होगी। कहने की जरूरत नहीं है कि यदि कोई छात्र एमबीबीएस हिंदी या किसी अन्य क्षेत्रीय भाषा में पास करता है, तो उसे न केवल विदेशों में, बल्कि हमारे देश के अन्य राज्यों में भी उच्च अध्ययन करते समय समस्याओं का सामना करना पड़ेगा।

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उल्लेखनीय है कि न केवल चिकित्सा शिक्षा में, बल्कि एनईपी 2020 भी विभिन्न क्षेत्रों में अपनी-अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में उच्च अध्ययन में शिक्षण और सीखने को बढ़ावा देने के लिए कहता है। इसे बढ़ावा देने के लिए विभिन्न सरकारों के उपेक्षापूर्ण रवैये के कारण अधिकांश क्षेत्रीय भाषाओं की खराब स्थिति को देखते हुए, इस प्रक्रिया को लागू करने से इन क्षेत्रों में शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में एक बड़ा अवरोध पैदा होगा, जिससे भारी शैक्षणिक अराजकता पैदा होगी।

हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के अलावा, राज्य के मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया कि पर्चे में ‘श्री हरि’ लिखा जाना चाहिए। यह अस्वीकार्य है क्योंकि चिकित्सा विज्ञान सभी धर्म और जाति विभाजन से ऊपर है। एक महत्वपूर्ण पद पर बैठे हुए ऐसा व्यक्ति इतनी गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी कैसे कर सकता है? तो, यह आसानी से समझा जा सकता है कि हिंदी में चिकित्सा शिक्षा शुरू करने के नाम पर, वे इस महान पेशे को भी सांप्रदायिक और भगवाकरण करने की कोशिश कर रहे हैं।

केंद्र सरकार चिकित्सा शिक्षा के आधार पर पर्दा डालने के लिए इन आकर्षक कदमों को बढ़ावा दे रही है जो पूरी तरह से कमजोर है।

प्रासंगिक रूप से, यहां यह उल्लेख किया जा सकता है कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी), चिकित्सा शिक्षा का निजीकरण और नौकरशाही करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा पारित जघन्य अधिनियम, आम लोगों से स्वास्थ्य सेवाओं को छीनने के लिए ही परिवर्तन ला रहा है। अधिकांश मेडिकल कॉलेजों के बुनियादी ढांचे बराबर हैं, जबकि कई संस्थानों में आवश्यक उपकरण या जांच सुविधाएं नहीं हैं, जिससे इलाज और चिकित्सा शिक्षा दोनों में बाधा आती है। हम सभी मेडिकल छात्रों, डॉक्टरों, स्वास्थ्य कर्मियों और आम लोगों का आह्वान करते हैं कि वे इन जनविरोधी कदमों के खिलाफ एकजुट हों और इसका विरोध करें ताकि चिकित्सा के इस नेक पेशे को सांप्रदायिक ताकतों के लगातार हमलों से बचाया जा सके।

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रेलवे ट्रैक पर मिला महिला का शव, 24 घंटे में पुलिस ने सुलझाई हत्या की गुत्थी

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सरायकेला : यशपुर रेलवे फाटक से महज 100 मीटर की दूरी पर पड़ा महिला का शव अब एक सनसनीखेज हत्या की गवाही दे रहा है। यह मामला सरायकेला जिले के गम्हरिया थाना क्षेत्र का है, जहाँ एक अज्ञात महिला की लाश रेलवे ट्रैक पर मिलने से पूरे इलाके में हड़कंप मच गया।

स्थानीय लोगों की सूचना पर मौके पर पहुँची पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर जांच शुरू की। शुरुआत में मामला आत्महत्या का प्रतीत हो रहा था, लेकिन पुलिस की सतर्कता और एसडीपीओ के नेतृत्व में गठित एसआईटी (विशेष जांच टीम) ने महज 24 घंटे में इस रहस्य से पर्दा हटा दिया।

पुलिस ने मृतका की पहचान भवानी कैवर्त के रूप में की, जो कि नारायणपुर गांव, सरायकेला की रहने वाली थीं। लेकिन इससे भी चौंकाने वाला तथ्य तब सामने आया जब जांच में पता चला कि इस हत्या को अंजाम किसी और ने नहीं, बल्कि महिला के अपने पोते लक्ष्मण कैवर्त और उसके साथी चंदन कैवर्त ने ही दिया।

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एसडीपीओ के अनुसार, प्रारंभिक पूछताछ में यह स्पष्ट हुआ है कि हत्या आपसी पारिवारिक विवाद के चलते की गई। हत्या को रेलवे दुर्घटना की शक्ल देने के लिए महिला के शव को ट्रैक पर फेंक दिया गया था। लेकिन पुलिस की टीम ने तकनीकी साक्ष्य, कॉल रिकॉर्ड और मौके की बारीकी से जांच कर साजिश की परतें खोल दीं।

फिलहाल दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है, और मामले की आगे की जांच जारी है। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि इस घटना में और कौन-कौन लोग शामिल हो सकते हैं।

इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि अपराध चाहे जितना भी शातिर तरीके से क्यों न किया गया हो, कानून की नजर से छुप नहीं सकता।

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ट्रेन लेट होना अब सिर्फ असुविधा नहीं, एक सामाजिक अन्याय बन चुका है।

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ट्रेन लेट होना अब सिर्फ असुविधा नहीं, एक सामाजिक अन्याय बन चुका है। सरकार और रेलवे को इस पर ध्यान देना होगा। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब लोग यह कहने लगेंगे : “रेल यात्रा का मतलब है—अनिश्चितता, असुरक्षा और असंवेदनशीलता।”

  • क्या समय पर पहुँचना अब सपना बन गया है? – ट्रेन लेट होने की त्रासदी

SOCIAL DIARY : 31 मार्च 2025 का दिन, नई दिल्ली से पूरी जाने वाली ट्रेन संख्या 18102 चांडिल स्टेशन पर सुबह 11:00 बजे पहुँची, और टाटानगर जंक्शन तक पहुँचते-पहुँचते तीन घंटे 40 मिनट की देरी हो चुकी थी।

अब यह केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी हैं कई अनकही कहानियाँ — कोई परीक्षार्थी जो साल भर की मेहनत के बाद परीक्षा केंद्र पहुंचने की दौड़ में था, कोई बेटा जो अपनी बीमार माँ से आखिरी बार मिलना चाहता था, कोई महिला जो अपने बीमार बच्चे को अस्पताल ले जा रही थी।

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लेकिन क्या रेलवे को इन कहानियों से कोई फर्क पड़ता है?

  • ट्रेन लेट होना: आम जनजीवन पर एक गंभीर प्रभाव

भारतीय रेल देश की जीवनरेखा मानी जाती है। करोड़ों लोग प्रतिदिन रेल सेवाओं का उपयोग करते हैं—कोई काम पर जाता है, कोई इलाज के लिए सफर करता है, कोई परीक्षा देने निकलता है, तो कोई अपनों से मिलने। लेकिन जब यही ट्रेनें समय से नहीं चलतीं, तो आम जनता के जीवन पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ता है। ट्रेन लेट होना भारत में वर्षों से एक सामान्य समस्या रही है, लेकिन इसके पीछे छिपे दर्द और संकटों की आवाज़ अब बुलंद होनी चाहिए।

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जब ट्रेन लेट होती है, तो सिर्फ समय नहीं जाता — उम्मीदें, मौके और कभी-कभी जान भी चली जाती है।

रेलवे देरी के पीछे “तकनीकी खराबी”, “भीड़”, या “मौसम” जैसे कारण गिनाता है। मगर उन लोगों का क्या जो इस देरी के कारण परीक्षा नहीं दे पाते, अस्पताल नहीं पहुँच पाते, या जिन्हें अपनों की आखिरी सांसें पकड़ने का मौका तक नहीं मिलता?

  • क्या कोई जवाबदेही है?
  • क्या कोई अधिकारी यह मानता है कि उसकी व्यवस्था के कारण किसी की ज़िंदगी तबाह हुई?

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आज की घटना एक उदाहरण है, समस्या नहीं

यह तो हर रोज़ की कहानी बन चुकी है। देशभर में हर दिन दर्जनों ट्रेनें घंटों लेट होती हैं। लेकिन हमारी समस्या सिर्फ ट्रेन लेट होना नहीं है, समस्या है — इस देरी को सामान्य मान लेना

हमने समय पर चलने की उम्मीद छोड़ दी है। यह खतरनाक है।

ट्रेन लेट होना केवल असुविधा नहीं, यह एक अधिकार हनन है

क्या एक नागरिक को यह अधिकार नहीं है कि वह समय पर पहुंचे? क्या सरकार की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह ऐसी व्यवस्था दे जो भरोसेमंद हो?
जैसा कि श्री अमरिख सिंह, जिला उपाध्यक्ष, आम आदमी पार्टी (पूर्वी सिंहभूम) ने कहा:

“अगर किसी की मृत्यु हो जाती है, किसी का एग्जाम छूट जाता है, तो इसका जिम्मेदार कौन है? यह अमानवीय कार्य बंद होना चाहिए।”

यह प्रश्न केवल एक व्यक्ति का नहीं है, यह हर उस नागरिक का है जो रेल व्यवस्था पर निर्भर है।

अब वक्त है बदलाव का

रेलवे को चाहिए कि वह—

  • हर स्टेशन पर रीयल टाइम सूचना प्रणाली को मजबूत करे
  • देरी की स्थिति में यात्रियों को मुआवजा दे
  • गंभीर मामलों में जवाबदेही तय करे
  • आपातकालीन यात्राओं के लिए प्राथमिकता को सिस्टम में शामिल करे

 

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घटना का संदर्भ:
31 मार्च 2025 को नई दिल्ली से पूरी जाने वाली ट्रेन संख्या 18102, जो टाटानगर होते हुए गुजरती है, चांडिल स्टेशन पर 11:00 बजे पहुँची। यह ट्रेन टाटा जंक्शन में तीन घंटे 40 मिनट की देरी से पहुँची। इस ट्रेन में कई परीक्षार्थी अपने एग्जाम देने जा रहे थे, कुछ लोग अपने बीमार माता-पिता से मिलने, तो कुछ मरीजों को अस्पताल ले जाने के लिए सफर कर रहे थे।

इस देरी के कारण कई संभावनाएं संकट में पड़ीं—अगर कोई मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुँचता और उसकी जान चली जाती है, या किसी छात्र की परीक्षा छूट जाती है, तो इसका जिम्मेदार कौन है? क्या रेलवे प्रशासन अपनी जवाबदेही स्वीकार करता है?

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ट्रेन लेट होने के कारण:

  1. तकनीकी खराबियाँ: लोकोमोटिव में तकनीकी खराबियाँ अक्सर ट्रेनों की लेटलतीफी का कारण बनती हैं।
  2. पुरानी इंफ्रास्ट्रक्चर: रेलवे ट्रैक और सिग्नलिंग प्रणाली का आधुनिकीकरण न हो पाना।
  3. मौसम की मार: कोहरा, बारिश, और बाढ़ जैसे प्राकृतिक कारण भी प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
  4. ऑपरेशनल मिसमैनेजमेंट: ट्रेनों का समय पर प्लेटफॉर्म न मिल पाना या गलत टाइम टेबल मैनेजमेंट।
  5. राजनीतिक और वीआईपी मूवमेंट: कई बार विशेष ट्रेनों को प्राथमिकता देने से आम यात्री गाड़ियों की अनदेखी की जाती है।

आम जनजीवन पर प्रभाव:

  • छात्रों पर असर: परीक्षा से चूकना न केवल एक मौके का नुकसान है, बल्कि मानसिक और भविष्यगत तनाव भी है।
  • बीमार यात्रियों के लिए संकट: मेडिकल एमरजेंसी में देरी जानलेवा साबित हो सकती है।
  • कामकाजी लोगों का नुकसान: समय पर नौकरी पर न पहुँचने से वेतन कटौती या नौकरी पर खतरा हो सकता है।
  • मानसिक तनाव और असुविधा: घंटों प्रतीक्षा करना, खानपान की समस्याएँ, और थकावट यात्रियों के अनुभव को नकारात्मक बना देती है।
  • परिवारिक समस्याएं: शादी, अंतिम संस्कार या किसी जरूरी पारिवारिक कार्यक्रम में देर होने से सामाजिक पीड़ा उत्पन्न होती है।

जवाबदेही का सवाल:
जब ऐसी घटनाएं होती हैं, तो रेलवे प्रशासन अक्सर “अनुकूल परिस्थितियों” का हवाला देकर पल्ला झाड़ लेता है। लेकिन एक लोकतांत्रिक देश में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है। समय पर सेवा देना, खासकर जीवन-मृत्यु या भविष्य से जुड़ी यात्राओं में, कोई सुविधा नहीं, बल्कि एक अधिकार है।

जैसा कि श्री अमरिख सिंह (जिला उपाध्यक्ष, आम आदमी पार्टी, पूर्वी सिंहभूम) ने भी कहा है, अगर ऐसी घटनाओं में किसी की मृत्यु होती है या किसी का भविष्य संकट में पड़ता है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी रेलवे प्रशासन की होनी चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह इस अमानवीय व्यवस्था पर रोक लगाए और आम लोगों के अधिकारों का हनन बंद करे।

समाधान के सुझाव:

  1. रेलवे सिस्टम का आधुनिकीकरण और तकनीकी सुधार।
  2. टाइम टेबल में पारदर्शिता और वास्तविक समय पर अपडेट।
  3. यात्रियों को देरी की स्थिति में मुआवजा और वैकल्पिक सुविधा देना।
  4. ट्रेन संचालन में ज़िम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करना।
  5. रेल यात्रियों की आपातकालीन आवश्यकताओं के लिए विशेष व्यवस्था करना।

निष्कर्ष:
ट्रेन लेट होना एक सामान्य समस्या नहीं रह गई है। यह आम जनता के जीवन, भविष्य और स्वास्थ्य से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा है। सरकार और रेलवे प्रशासन को चाहिए कि वे इसे गंभीरता से लें, ताकि आम आदमी को राहत मिल सके और रेल यात्रा फिर से समयबद्ध, भरोसेमंद और मानवीय बन सके। ट्रेन लेट होना अब सिर्फ असुविधा नहीं, एक सामाजिक अन्याय बन चुका है। सरकार और रेलवे को इस पर ध्यान देना होगा। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब लोग यह कहने लगेंगे—
“रेल यात्रा का मतलब है—अनिश्चितता, असुरक्षा और असंवेदनशीलता।”

समय पर ट्रेन चलाना सिर्फ तकनीक का सवाल नहीं, यह नैतिक ज़िम्मेदारी है। और यह जिम्मेदारी अब टाली नहीं जा सकती।

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मंजीत सिंह ने मीडिया के माध्यम से जिला पुलिस प्रशासन से की अपील, जल्द न्याय मिलने की लगाई आस।

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लोकतंत्र के चौथे स्तंभ से गुहार : मंजीत सिंह ने मीडिया के माध्यम से जिला पुलिस प्रशासन से अपील की है कि उनके द्वारा दर्ज मामलों में जल्द से जल्द न्यायिक कार्यवाही सुनिश्चित की जाए ताकि उन्हें न्याय मिल सके।

जमशेदपुर: रवि ट्रांसपोर्ट सर्विसेस के संचालक मंजीत सिंह ने जिला पुलिस प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि उनके द्वारा दर्ज कराए गए विभिन्न आपराधिक मामलों में अब तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं की गई है। उन्होंने बताया कि उनके द्वारा रविंदर सिंह, मनमीत कौर, मनजोत सिंह, हर्षवीर सिंह, तर्जित सिंह, अमरदीप कौर एवं अन्य के विरुद्ध विभिन्न थाना क्षेत्रों में मुकदमे दायर किए गए हैं, जो वर्तमान में अनुसंधान के अधीन हैं।

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दायर मामलों का विवरण:

  • चांडिल थाना कांड संख्या 215/2024 (दिनांक 17.09.2024) – भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 115(2), 117(2), 352, 351(2), 74, 79, 316(2), 318(4), 304(2) एवं 3(5) के तहत मामला दर्ज।
  • सीतारामडेरा थाना कांड संख्या 05/2025 (दिनांक 12.01.2025) – धारा 338, 336, 340, 316, 318, 61(2) के तहत मामला दर्ज।
  • साइबर क्राइम थाना कांड संख्या 74/2023 (दिनांक 08.12.2023) – भारतीय दंड संहिता की धारा 419, 379, 420 एवं सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66 (B) के तहत मामला दर्ज।
  • बिष्टुपुर थाना कांड संख्या 21/2024 (दिनांक 22.01.2024) – धारा 406, 420, 467, 468, 471, 34 के तहत मामला दर्ज।
  • गोलमुरी थाना कांड संख्या 09/2025 (दिनांक 17.01.2025) – धारा 406, 408, 419, 420, 467, 468, 471, 72, 34 के तहत मामला दर्ज।

पुलिस की निष्क्रियता पर उठाए सवाल

मंजीत सिंह ने बताया कि इन सभी मामलों में अनुसंधानकर्ता द्वारा उनका एवं गवाहों का बयान दर्ज करने के बावजूद कोई ठोस कार्यवाही नहीं की गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से अभियुक्तों को लाभ पहुंचा रही है।

उन्होंने यह भी बताया कि जिला पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को भी मौखिक एवं लिखित रूप से मामले की जानकारी दी जा चुकी है, लेकिन फिर भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

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