स्वास्थ्य
आज 10 अल्ट्रासाउंड सेंटर्स को सर्टिफिकेट इश्यू हो गया, आईएमए और IRIA ने जमशेदपुर उपायुक्त विजया मैडम को दिया धन्यवाद
जमशेदपुर | झारखंड
आईएमए और IRIA जमशेदपुर शाखा ने जमशेदपुर उपायुक्त विजया मैडम को धन्यवाद देते हुए खा की माननीय हाई कोर्ट का निर्णय हमारे पक्ष में आने के बाद उन्होंने त्वरित कार्यवाही लिया और सभी सेंटर्स को तत्काल रिन्यूअल सर्टिफिकेट इश्यू करवाया। इसके लिए जांच टीम द्वारा ओवरटाइम काम करवाया गया और प्रॉपर जांच के बाद आज शहर के लगभग सभी 10 सेंटर्स को सर्टिफिकेट इश्यू किया गया। उपायुक्त महोदया ने लोगों को हो रही दिक्कत और सेंटर्स की परेशानी, दोनो को समझा।
निचे निम्नलिखित केंद्रों को नवीनीकरण प्रमाणपत्र मिल गया है –
इंदु अल्ट्रासाउंड कदमा,
आइडियल इमेजिंग बाराद्वारी,
साईं स्कैन सेंटर, साकची
दृष्टि डायग्नोस्टिक और इमेजिंग सिधगोड़ा
कमल प्रसूति, मानगो
अभिनव क्लिनिक, मानगो
डायलाब सेंटर, मानगो
डॉ उदय निदान केंद्र, भालुबासा
श्रृष्टि और दृष्टि, बारद्वारी
स्वास्थ्य
“हां! हम टीबी को खत्म कर सकते हैं: संकल्प, निवेश, समाधान”

विश्व तपेदिक रोग (टीबी) दिवस (24 मार्च) के अवसर पर विशेष आलेख – डॉ. श्रीकांत अग्रवाल, विशेषज्ञ, मेडिकल इंडोर सर्विसेज, टाटा मेन हॉस्पिटल
Health : हर साल, 24 मार्च को विश्व तपेदिक दिवस के रूप में मनाया जाता है, ताकि दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारी तपेदिक (टीबी) को खत्म करने की जरूरत पर जोर दिया जा सके। यह बीमारी अब भी लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित कर रही है, जिससे न केवल गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं, बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था पर भी भारी असर पड़ रहा है।
इस वर्ष की थीम है “हां! हम टीबी को खत्म कर सकते हैं: संकल्प, निवेश, समाधान”। यह न केवल अब तक के प्रयासों पर चिंतन करने का अवसर देती है, बल्कि स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टीबी उन्मूलन के प्रति मजबूत प्रतिबद्धता को प्रोत्साहित करती है। इसमें दवा-प्रतिरोधी टीबी के बढ़ते खतरे से निपटने के प्रयास भी शामिल हैं।
टीबी एक संक्रामक वायुजनित बीमारी है, जो मुख्य रूप से मायकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस बैक्टीरिया के कारण होती है और आमतौर पर फेफड़ों को प्रभावित करती है। यह तब फैलती है जब संक्रमित व्यक्ति खांसता, छींकता या थूकता है, जिससे बैक्टीरिया हवा में फैल जाते हैं। टीबी का संक्रमण फैलने के लिए केवल कुछ बैक्टीरिया का सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करना ही काफी होता है।
टीबी के कारणों, लक्षणों, जांच, इलाज और रोकथाम की समझ होना न केवल व्यक्तिगत बल्कि सामुदायिक स्तर पर भी इस बीमारी के प्रसार को रोकने में मदद कर सकता है। यदि समय पर इलाज न किया जाए, तो यह घातक हो सकती है, लेकिन सही और संपूर्ण उपचार से इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है।
टीबी संक्रमण का खतरा उन लोगों के लिए अधिक होता है जो:
कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली से जूझ रहे हों, जैसे एचआईवी/एड्स, मधुमेह, क्रॉनिक किडनी रोग के मरीज, कीमोथेरेपी ले रहे लोग या इम्यूनोसप्रेसिव दवाओं का सेवन करने वाले।
- किसी सक्रिय टीबी मरीज के लगातार संपर्क में रहते हों।
- भीड़भाड़ या अस्वच्छ वातावरण में रहने को मजबूर हों, जहां संक्रमण फैलने की संभावना अधिक हो।
भीड़भाड़ और खराब वेंटिलेशन वाले स्थानों में टीबी फैलने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। - टीबी मुख्य रूप से फेफड़ों (पल्मोनरी टीबी) को प्रभावित करती है, लेकिन यह शरीर के अन्य अंगों को भी नुकसान पहुंचा सकती है, जैसे लिंफ नोड (गले की गांठ), पेट (एब्डॉमिनल टीबी) और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (सीएनएस टीबी)।
टीबी को दवा के प्रति संवेदनशीलता के आधार पर दो श्रेणियों में बांटा जाता है:
- दवा-संवेदनशील टीबी – जब टीबी बैक्टीरिया मानक प्रथम-पंक्ति की एंटी-टीबी दवाओं से आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।
- दवा-प्रतिरोधी टीबी / एमडीआर टीबी) – जब टीबी बैक्टीरिया कम से कम एक प्रभावी एंटी-टीबी दवा के प्रति प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं, जिससे इलाज अधिक कठिन और जटिल हो जाता है।
टीबी के लक्षण संक्रमण की जगह और गंभीरता के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। आम लक्षणों में शामिल हैं:
- लगातार खांसी – तीन सप्ताह या उससे अधिक समय तक बनी रहने वाली खांसी।
- सीने में दर्द और खांसी में खून आना।
- थकान और कमजोरी – बिना किसी स्पष्ट कारण के कमजोरी या सुस्ती महसूस होना।
- अचानक वजन कम होना।
- रात में पसीना आना और हर शाम हल्का बुखार रहना।
- गले की ग्रंथियों में सूजन।
टीबी के सटीक निदान के लिए निम्नलिखित परीक्षण किए जाते हैं:
- छाती का एक्स-रे – फेफड़ों में संक्रमण की जांच के लिए।
- थूक परीक्षण – थूक में टीबी बैक्टीरिया की उपस्थिति की पुष्टि के लिए।
- सीटी थोरैक्स और ब्रोंकोस्कोपी – यदि मरीज थूक नहीं निकाल पा रहा हो तो इन परीक्षणों का उपयोग किया जाता है।
टीबी का उपचार लंबे समय तक दवाओं के संयोजन से किया जाता है:
- दवा-संवेदनशील टीबी (DSTB) – इस प्रकार की टीबी के इलाज के लिए आमतौर पर 6 महीने तक एंटी-टीबी दवाओं का संयोजन दिया जाता है।
- दवा-प्रतिरोधी टीबी (DRTB) – यदि बैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाए, तो उपचार 9 से 20 महीने तक चल सकता है, जो संक्रमण की गंभीरता और रोगी की प्रतिक्रिया पर निर्भर करता है।
टीबी से बचाव के उपाय
- बीसीजी वैक्सीन – जन्म के समय दी जाने वाली यह वैक्सीन छोटे बच्चों को टीबी के गंभीर रूपों से बचाने में प्रभावी होती है।
- नियमित जांच – खासतौर पर हाई-रिस्क ग्रुप में टीबी की समय पर पहचान के लिए स्क्रीनिंग जरूरी है, जिससे रोग का जल्द पता लगाकर इलाज शुरू किया जा सके।
- संक्रमण नियंत्रण उपाय – मास्क पहनना, भीड़भाड़ से बचना और बेहतर वेंटिलेशन सुनिश्चित करना टीबी के प्रसार को रोकने में मदद कर सकता है।
टीबी दुनिया की सबसे पुरानी वायुजनित महामारी है, जो अब भी वैश्विक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती बनी हुई है और अन्य किसी भी संक्रामक बीमारी की तुलना में अधिक लोगों की जान लेती है। लेकिन यदि हम ठोस कार्रवाई करें, स्वास्थ्य संसाधनों में सही दिशा में निवेश करें और प्रभावी उपचार व रोकथाम सुनिश्चित करें, तो हां! हम मिलकर टीबी को हमेशा के लिए खत्म कर एक नया इतिहास रच सकते हैं।
स्वास्थ्य
क्या फिर लगेगा लॉकडाउन! भारत में मिला खतरनाक HMP वायरस। जानें यह कोरोना वायरस से कितना भयंकर है।

HEALTH : HMP वायरस, जिसे वैज्ञानिक रूप से ह्यूमन मेटापनेउमोवायरस (Human Metapneumovirus, HMPV) के नाम से जाना जाता है, एक रेस्पिरेटरी वायरस है। यह वायरस इंसानों के श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है और मुख्यतः बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों को प्रभावित करता है।
HMP वायरस का इतिहास:
- पहचान:
HMP वायरस की पहचान पहली बार 2001 में नीदरलैंड्स में हुई थी। इसे पैरामाइक्सोविरिडे (Paramyxoviridae) फैमिली का सदस्य माना जाता है, जो अन्य वायरस जैसे रेस्पिरेटरी सिंसिशियल वायरस (RSV) और मीज़ल्स (Measles) से संबंधित है। - संक्रमण के लक्षण:
- बुखार
- खांसी
- गले में खराश
- नाक बंद या बहना
- सांस लेने में तकलीफ (severe cases में)
- निमोनिया और ब्रोंकियोलाइटिस जैसे गंभीर लक्षण हो सकते हैं, खासकर बच्चों और बुजुर्गों में।
- संक्रमण का प्रसार:
यह वायरस इंसानों में श्वसन बूंदों (respiratory droplets) के माध्यम से फैलता है। यह RSV के समान संक्रमण का कारण बनता है और आमतौर पर सर्दियों और वसंत के मौसम में सक्रिय रहता है। - चिकित्सा और उपचार:
- HMP वायरस के लिए फिलहाल कोई विशेष एंटीवायरल दवा या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है।
- उपचार मुख्य रूप से लक्षणों को कम करने और मरीज की स्थिति को स्थिर रखने पर आधारित होता है, जैसे हाइड्रेशन, बुखार के लिए दवाएं, और ऑक्सीजन सपोर्ट।
- महत्वपूर्ण बिंदु:
- अधिकांश संक्रमित व्यक्ति हल्के लक्षणों के साथ ठीक हो जाते हैं।
- कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों और बच्चों में यह वायरस गंभीर संक्रमण का कारण बन सकता है।

Image Source : en.wikipedia.org
भारत में HMP वायरस का केस:
भारत में HMP वायरस का पहला मामला बेंगलुरु में 8 महीने के एक बच्चे में पाया गया। यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि बच्चे की कोई चीन यात्रा की हिस्ट्री नहीं है, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह वायरस लोकल स्तर पर भी प्रसारित हो सकता है। इससे यह समझ आता है कि HMP वायरस का संक्रमण अब वैश्विक हो चुका है और इसका ध्यानपूर्वक अध्ययन व निगरानी आवश्यक है।
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HMP वायरस (ह्यूमन मेटापनेउमोवायरस) और कोरोना वायरस (SARS-CoV-2, जो COVID-19 का कारण बना) में कई अंतर हैं। इनकी तुलना निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से की जा सकती है:
1. वायरस का प्रकार
- HMP वायरस: यह पैरामाइक्सोविरिडे (Paramyxoviridae) परिवार से संबंधित है।
- कोरोना वायरस: यह कोरोनाविरिडे (Coronaviridae) परिवार से संबंधित है।
2. पहचान
- HMP वायरस: पहली बार 2001 में नीदरलैंड्स में खोजा गया।
- कोरोना वायरस: SARS-CoV-2 की पहचान 2019 में चीन के वुहान शहर में हुई।
3. लक्षण
- HMP वायरस:
- हल्का बुखार
- खांसी
- गले में खराश
- सांस लेने में तकलीफ (गंभीर मामलों में)
- मुख्य रूप से बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों को प्रभावित करता है।
- कोरोना वायरस:
- तेज बुखार
- सूखी खांसी
- स्वाद और गंध का चले जाना
- मांसपेशियों में दर्द
- सांस की गंभीर समस्या (गंभीर मामलों में निमोनिया)
- यह किसी भी आयु वर्ग को प्रभावित कर सकता है, हालांकि गंभीर मामले बुजुर्गों और कोमोरबिडिटी वाले लोगों में अधिक देखे गए।
4. संक्रमण का प्रसार
- HMP वायरस:
- यह मुख्य रूप से श्वसन बूंदों (respiratory droplets) से फैलता है।
- यह अक्सर सर्दियों और वसंत ऋतु में अधिक सक्रिय होता है।
- कोरोना वायरस:
- यह श्वसन बूंदों, सतहों के संपर्क और एयरोसोल के माध्यम से तेजी से फैलता है।
- यह सालभर सक्रिय रह सकता है और अत्यधिक संक्रामक है।
5. गंभीरता और मृत्यु दर
- HMP वायरस:
- सामान्यत: हल्के लक्षणों वाला होता है।
- गंभीरता दुर्लभ है और मुख्यतः कमजोर इम्यूनिटी वाले व्यक्तियों में होती है।
- कोरोना वायरस:
- उच्च संक्रमण दर और गंभीर लक्षण, जिनमें मृत्यु का खतरा अधिक होता है, खासकर बिना टीकाकरण वाले लोगों में।
6. उपचार और वैक्सीन
- HMP वायरस:
- इसका कोई विशिष्ट इलाज या वैक्सीन नहीं है।
- इलाज लक्षणों को नियंत्रित करने पर आधारित है।
- कोरोना वायरस:
- इसके लिए कई वैक्सीन (जैसे Covaxin, Covishield, Pfizer, आदि) उपलब्ध हैं।
- एंटीवायरल दवाएं (जैसे रेमडेसिविर) और मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का उपयोग गंभीर मामलों में किया जाता है।
7. वैश्विक प्रभाव
- HMP वायरस:
- यह सीमित स्तर पर संक्रमण फैलाता है और महामारी का रूप नहीं लेता।
- कोरोना वायरस:
- यह एक वैश्विक महामारी (COVID-19) का कारण बना, जिसने लाखों लोगों की जान ली और व्यापक सामाजिक-आर्थिक प्रभाव डाला।
वायरस से बचाव के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं:
1. स्वच्छता बनाए रखें
- अपने हाथों को नियमित रूप से साबुन और पानी से कम से कम 20 सेकंड तक धोएं।
- अगर साबुन उपलब्ध न हो, तो 60% अल्कोहल आधारित सैनिटाइज़र का उपयोग करें।
- अपनी आंख, नाक और मुंह को गंदे हाथों से छूने से बचें।
2. भीड़भाड़ से बचें
- सार्वजनिक स्थानों पर जाने से बचें, विशेषकर जब वहां ज्यादा भीड़ हो।
- बीमार व्यक्तियों से कम से कम 6 फीट की दूरी बनाए रखें।
3. मास्क पहनें
- बाहर जाते समय या भीड़भाड़ वाली जगहों पर मास्क का उपयोग करें।
- मास्क को नियमित रूप से धोएं या बदलें (यदि यह डिस्पोजेबल है)।
4. सांस की स्वच्छता अपनाएं
- खांसते या छींकते समय अपनी नाक और मुंह को टिशू या कोहनी से ढकें।
- इस्तेमाल किए गए टिशू को तुरंत कूड़ेदान में डालें और हाथ धो लें।
5. इम्यूनिटी मजबूत करें
- संतुलित आहार लें जिसमें फल, सब्जियां, दालें और प्रोटीन शामिल हों।
- रोजाना 7-8 घंटे की नींद लें।
- नियमित रूप से योग और व्यायाम करें।
- विटामिन C और D युक्त भोजन का सेवन करें।
6. स्वास्थ्य पर ध्यान दें
- अगर आपको बुखार, खांसी या सांस लेने में तकलीफ हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
- अपने शरीर में हो रहे किसी भी असामान्य लक्षण को नजरअंदाज न करें।
7. टीकाकरण करवाएं
- अगर किसी वायरस के लिए टीका उपलब्ध है, तो उसे समय पर लगवाएं।
- टीकाकरण से गंभीर संक्रमण और इसके प्रभाव से बचा जा सकता है।
8. सतहों की सफाई करें
- ऐसी सतहों को नियमित रूप से साफ और कीटाणुरहित करें जिन्हें अक्सर छुआ जाता है, जैसे मोबाइल, डोर हैंडल, लाइट स्विच आदि।
9. जानकारी से सचेत रहें
- सही और विश्वसनीय स्रोतों (जैसे WHO, स्वास्थ्य मंत्रालय) से ही वायरस से संबंधित जानकारी प्राप्त करें।
- अफवाहों और गलत जानकारी से बचें।
10. बीमार महसूस करने पर अलग रहें
- अगर आप बीमार महसूस कर रहे हैं, तो घर पर रहें और दूसरों से संपर्क कम करें।
- लक्षण गंभीर होने पर डॉक्टर से सलाह लें।
इन सरल उपायों को अपनाकर आप न केवल खुद को बल्कि अपने परिवार और समाज को भी वायरस से सुरक्षित रख सकते हैं।
HMP वायरस और कोरोना वायरस दोनों ही श्वसन तंत्र को प्रभावित करते हैं, लेकिन कोरोना वायरस अधिक संक्रामक, घातक और व्यापक प्रभाव डालने वाला है। वहीं, HMP वायरस अपेक्षाकृत हल्का और सीमित प्रभाव वाला है। दोनों से बचाव के लिए स्वच्छता, भीड़भाड़ से बचना, और स्वस्थ जीवनशैली अपनाना महत्वपूर्ण है।
स्वास्थ्य
नाड़ी चिकित्सा: आयुर्वेद की प्राचीन और अद्भुत पद्धति

आयुर्वेद : नाड़ी चिकित्सा आयुर्वेद की एक प्राचीन और प्रभावशाली चिकित्सा पद्धति है, जिसमें रोगी की नाड़ी की गति, तापमान, और ताल को देखकर उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति का विश्लेषण किया जाता है। यह पद्धति वैद्य या आयुर्वेदाचार्य द्वारा कलाई पर उंगलियां रखकर की जाती है।
नाड़ी से रोग पहचानने की प्रक्रिया
नाड़ी चिकित्सा के अनुसार, शरीर की नाड़ी विभिन्न अंगों और तंत्रों की स्थिति को दर्शाती है। नाड़ी की गति और ताल में मामूली बदलाव से भी रोगों का पता लगाया जा सकता है।
मुख्य पहलू:
- वात, पित्त और कफ का संतुलन:
आयुर्वेद के अनुसार, शरीर में तीन दोष होते हैं – वात, पित्त और कफ। नाड़ी की जांच कर इनके असंतुलन का पता लगाया जाता है, जिससे रोग का निदान और उपचार संभव होता है। - अंगों का स्वास्थ्य:
नाड़ी के माध्यम से शरीर के अंगों, जैसे हृदय, फेफड़े और पाचन तंत्र की स्थिति का विश्लेषण किया जा सकता है। - मनोदशा:
नाड़ी चिकित्सा से तनाव, चिंता और अवसाद जैसी मानसिक स्थितियों की पहचान की जा सकती है। यह पद्धति शरीर और मन के बीच के संबंध को समझने में सहायक है।
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इलाज की प्रक्रिया
नाड़ी चिकित्सा में इलाज व्यक्ति-विशेष पर आधारित होता है। वैद्य रोगी की नाड़ी की जांच कर उसके लिए विशेष उपचार योजना तैयार करते हैं।
मुख्य उपचार:
- आयुर्वेदिक औषधियां:
जड़ी-बूटियों, खनिजों और धातुओं से बनी औषधियों का प्रयोग रोगी की समस्याओं के आधार पर किया जाता है। - आहार:
दोषों के संतुलन के लिए विशेष आहार सुझाए जाते हैं। रोगी के शारीरिक दोषों के अनुसार भोजन में बदलाव करना महत्वपूर्ण होता है। - जीवनशैली में सुधार:
योग, ध्यान और व्यायाम को जीवनशैली में शामिल कर स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का प्रयास किया जाता है।
सावधानी और आधुनिक चिकित्सा के साथ सामंजस्य
नाड़ी चिकित्सा एक प्राचीन पद्धति है जो शरीर को समझने का अनूठा तरीका प्रदान करती है। हालांकि, इसे आधुनिक चिकित्सा का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। किसी भी गंभीर बीमारी के लिए एक योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य करें।
यदि आप नाड़ी चिकित्सा के बारे में और जानकारी चाहते हैं, तो अपने नजदीकी आयुर्वेदाचार्य से संपर्क करें और इस प्राचीन पद्धति का अनुभव करें।
Image Source: Microsoft Designer AI Tool
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