“सृष्टिकर्ता ब्रम्हा ने जब
बनाया ये संसार।
उसी समय कैसे कैसे
बन गया था प्यार।।
ब्रम्हा सोचे सबको अगर
मिल जायेगी प्यार।
भूल जायेंगे उसी में सब
कैसे चलेगी यार।।
पर छुपाऊं कंहा – कैसे
सहज ना कोई पाए।
दुर्लभ है, राधा-कृष्ण भी
जिसके लिए रोए।।
रेगिस्थान में छुपा डालूं या
समंदर के अथह तल ?
या पर्वत के नीचे छुपा दूं
या अंतरिक्ष प्रबल ??
आसानी से ना पाए कोई
बिना योग्य पात्रता।
अक्षुण्ण अटूट रहे सदा
इसकी अडिग पवित्रता।।
आसानी से मिल गया गर
अपात्र में चल जायेगा।
मन का चीज में तन मिलाकर
परिभाषा बदल जायेगा।।
पवित्र श्रम की सृष्टि हमारी
कुत्सित और कुरूप होगा।
जीवंत विनाश की प्रतिकृति
कलुषित और कुद्रुप होगा।।
गर सच्चे तपस्वी जो प्रेमी हैं
सिर्फ उसे मिले प्यार।
सुरक्षित रहेगी ये प्यार हमारी
खुशहाल होगी संसार।।”
– करुणामय मंडल, पूर्व जिला पार्षद पोटका, पूर्वी सिंहभूम झारखंड
विता के बारे में
यह कविता सृष्टि की उत्पत्ति और प्रेम की महत्ता पर आधारित एक कल्पनात्मक और दार्शनिक रचना है। कवि ने ब्रह्मा को सृष्टिकर्ता मानते हुए यह कल्पना की है कि जब संसार बना, तभी प्रेम भी अस्तित्व में आया। परंतु प्रेम को साधारण भावना नहीं, बल्कि एक तप, पात्रता और पवित्रता से जुड़ी दिव्य शक्ति के रूप में दिखाया गया है।
कविता यह संदेश देती है कि प्रेम हर किसी को सहज रूप से नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि यदि वह अपात्र हाथों में पड़ गया तो उसकी पवित्रता नष्ट हो जाएगी और उसका अर्थ केवल शारीरिक या स्वार्थपूर्ण संबंधों तक सीमित हो जाएगा।
संक्षिप्त भावार्थ
कवि कहते हैं कि सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने जब संसार की रचना की, उसी समय प्रेम भी उत्पन्न हुआ। ब्रह्मा ने सोचा कि यदि प्रेम सभी को आसानी से मिल गया, तो लोग अपने कर्तव्यों और जीवन के उद्देश्य को भूल जाएंगे। इसलिए प्रेम को अत्यंत दुर्लभ और पवित्र बनाया गया, ताकि वह केवल योग्य और सच्चे हृदय वाले लोगों को ही प्राप्त हो।
कवि कल्पना करते हैं कि ब्रह्मा सोचते हैं कि प्रेम को कहाँ छिपाया जाए — रेगिस्तान, समुद्र, पर्वत या अंतरिक्ष में — ताकि उसे हर कोई न पा सके। प्रेम को एक ऐसी अमूल्य निधि माना गया है, जिसे केवल तपस्वी, सच्चे और निष्ठावान प्रेमी ही प्राप्त कर सकते हैं।
यदि प्रेम अपात्र लोगों को मिल जाए, तो उसकी पवित्रता नष्ट हो जाती है और वह स्वार्थ, वासना और कुरूपता का रूप ले लेता है। परंतु जब प्रेम सच्चे, तपस्वी और निर्मल हृदय वालों के पास रहता है, तब संसार सुखी, संतुलित और सुंदर बनता है।
सार
यह कविता सिखाती है कि सच्चा प्रेम त्याग, तपस्या, पवित्रता और पात्रता से जुड़ा होता है, न कि केवल भावना या आकर्षण से। प्रेम एक दिव्य शक्ति है, जिसे संभालकर रखने से ही संसार में सुख और शांति बनी रहती है।









