“परातंत्रता मिट चुकी थी
मिल चुकी थी स्वतंत्रता।
गण की शासन जरूरत थी
थीं जरूरत गणतंत्रता।।
बिखरी हुई थी देश हमारी
हर ढांचे थी टूटी हुई।
दो सौ सालों की शोषण में
किस्मत थी फूटी हुई।।
मंजिल की राह दिखानी थी
देनी थीं आत्म सम्मान।
सुचारू व्यवस्था कायम हेतु
जरूरत थी सुसंविधान।।
आई फिर वो शुभ घड़ी थीं
आशा ना रही अधूरी।
बाबा साहब अम्बेडकर ने
कर दी ख्वाईशें पूरी।।
स्वतंत्र देश में सुशासन की
हुई फिर पूर्ण तैयारी।
गणतांत्रिक शासन लागू हुई
1950 की 26 जनवरी।।
देश के लिए पावन दिन था
था अद्भुत महोत्सव।
गणतंत्र शुभ स्थापित हुई
देश की दुर्लभ गौरव।।
सबको समान सम्मान मिला
मिटा ऊंच नीच भेद।
धनी गरीब समान कानून
रहा ना कोई विभेद।।
हमें जो ये मिले अधिकार
संविधान की दान है।
पर कर्तव्य जो लिखी हुई
शायद हम अंजान है।।
गणतंत्र दिवस की शुभ घड़ी में
आओ करें हम नए प्रण।
अधिकार और कर्तव्य का
करेंगे सटीक निर्वाहन।।
कानून हम नहीं तोड़ेंगे
करेंगे सहयोग सशक्त।
नई भारत बनाएंगे हम
लिखेंगे नई इबादत।।”
- करुणामय मंडल, पूर्व जिला पार्षद, पोटका, पूर्वी सिंहभूम, झारखंड
यह कविता भारत की स्वतंत्रता से गणतंत्र बनने तक की ऐतिहासिक यात्रा का भावपूर्ण वर्णन करती है। कवि बताते हैं कि अंग्रेज़ी दासता समाप्त होने के बाद देश को केवल आज़ादी ही नहीं, बल्कि एक सशक्त और न्यायपूर्ण शासन व्यवस्था की आवश्यकता थी। देश लंबे शोषण से बिखर चुका था, इसलिए उसे आत्मसम्मान, एकता और सुव्यवस्थित व्यवस्था देने के लिए संविधान की जरूरत थी।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने संविधान निर्माण कर देशवासियों के सपनों को पूरा किया और 26 जनवरी 1950 को भारत एक गणतंत्र राष्ट्र बना। इस दिन सभी नागरिकों को समान अधिकार और कानून के समक्ष समानता प्राप्त हुई, जिससे ऊँच-नीच और भेदभाव समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ा।
कविता यह भी संदेश देती है कि संविधान ने हमें अधिकार दिए हैं, पर साथ ही हमारे कर्तव्य भी हैं, जिनके प्रति हम अक्सर जागरूक नहीं रहते। गणतंत्र दिवस पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम कानून का पालन करेंगे, अपने कर्तव्यों का निर्वाह करेंगे और मिलकर एक सशक्त, अनुशासित और आदर्श भारत का निर्माण करेंगे।













