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पेसा कानून की आत्मा पर हमला आदिवासी अधिकारों को कमजोर करने का आरोप

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On: January 24, 2026 11:44 AM
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Jharkand Sarkar
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रांची:-पेसा अधिनियम 1996, जिसे आदिवासी समाज की पहचान, परंपरा और अस्तित्व की रक्षा के लिए बनाया गया था, आज उसी कानून के सहारे झारखंड में आदिवासी अधिकारों को कमजोर करने की साजिश रची जा रही है। आरोप है कि राज्य सरकार पेसा की मूल अवधारणा के विपरीत जाकर उसकी आत्मा को ही खत्म करने का प्रयास कर रही है।

पेसा कानून में स्पष्ट रूप से रूढ़िजन्य विधि, सामाजिक एवं धार्मिक प्रथाओं तथा पारंपरिक व्यवस्थाओं के संरक्षण की बात कही गई है। लेकिन झारखंड की नियमावली में इन प्रावधानों को ही गायब कर दिया गया, जो पेसा की मूल भावना पर सीधा हमला माना जा रहा है।

सरकार द्वारा पारंपरिक ग्राम प्रधानों के साथ-साथ अन्य श्रेणी के लिए पिछला दरवाजा खोल दिया गया है, जिससे ग्राम स्वशासन की अवधारणा कमजोर हुई है। इतना ही नहीं, ग्राम सभा की अनुमति को सहमति में बदलना और 30 दिनों में स्वतः स्वीकृति जैसे प्रावधान जोड़ना, ग्राम सभा के संवैधानिक अधिकारों को सीमित करने की खुली कोशिश बताया जा रहा है।

आदिवासी समाज का कहना है कि जब सुप्रीम कोर्ट तक ने ओडिशा के नियमगिरि पर्वत पर आदिवासियों की धार्मिक आस्थाओं का सम्मान करते हुए खनन पर रोक लगाई, तो राज्य सरकार को उनकी मान्यताओं को दरकिनार करने का कोई अधिकार नहीं है।

पूर्व में बनी नियमावली में ग्राम सभा को CNT और SPT एक्ट के उल्लंघन की स्थिति में जमीन वापस दिलाने का अधिकार प्राप्त था, जिसे मौजूदा सरकार ने हटा दिया। पहले शेड्यूल एरिया की जमीन के हस्तांतरण से पहले उपायुक्त को ग्राम सभा से सहमति लेना अनिवार्य था, लेकिन यह प्रावधान भी समाप्त कर दिया गया है।

पेसा अधिनियम 1996 में ग्राम सभाओं को जल, जंगल और जमीन से जुड़े अधिकार देने की बात स्पष्ट रूप से कही गई है, लेकिन झारखंड की नियमावली में इन अधिकारों को ही हटा दिया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब मूल अधिकार ही समाप्त कर दिए गए, तो इस नियमावली का औचित्य क्या रह जाता है।

आरोप यह भी है कि पहले सरकार ने ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल से राज्यपाल को हटाया और अब शेड्यूल एरिया में राज्यपाल के अधिकार सीमित कर सारे अधिकार उपायुक्त को सौंपे जा रहे हैं, ताकि प्रशासन मनमर्जी से फैसले ले सके कुल मिलाकर, आदिवासी संगठनों का कहना है कि जो पेसा कानून आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा और अस्तित्व की रक्षा के लिए बना था, उसी कानून का उपयोग कर झारखंड में आदिवासियों को हाशिये पर धकेलने और उनके अधिकार समाप्त करने की साजिश की जा रही है।

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