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झारखंड में पेसा कानून लागू | क्या है पेसा कानून? लाभ व चुनौतियों का विश्लेषण

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On: January 1, 2026 7:44 PM
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रांची : झारखंड सरकार ने राज्य में पेसा (Panchayats Extension to Scheduled Areas) कानून की नियमावली लागू कर दी है। यह कदम विशेष रूप से अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

क्या है पेसा कानून?

पेसा अधिनियम, 1996 संसद द्वारा बनाया गया एक विशेष कानून है, जिसे अनुसूचित क्षेत्रों वाले राज्यों में पंचायत राज व्यवस्था को स्थानीय परंपराओं, संस्कृति और स्वशासन के अनुरूप लागू करने के उद्देश्य से लाया गया था।
इसके तहत—

  • ग्रामसभा को सर्वोच्च अधिकार प्राप्त होता है
  • जल, जंगल, जमीन व स्थानीय संसाधनों पर ग्रामसभा का नियंत्रण
  • खनिज, लघु वनोपज और स्थानीय व्यापार पर निर्णय अधिकार
  • सामाजिक न्याय, परंपरागत रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक संरक्षण की जिम्मेदारी

झारखंड में इस कानून का उद्देश्य ग्रामीणों को अपने संसाधनों पर मालिकाना हक और निर्णय की शक्ति देना है।

आइये विस्तार से जानें – क्या है पेसा कानून?

भारत में आदिवासी और अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए वर्ष 1996 में संसद द्वारा एक विशेष अधिनियम बनाया गया—

  • पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996
  • इसे ही आमतौर पर पेसा कानून (PESA Act) कहा जाता है।

इसका मुख्य उद्देश्य आदिवासी समुदायों को स्वशासन, संसाधनों पर अधिकार, सामाजिक-सांस्कृतिक संरक्षण और निर्णय की शक्ति प्रदान करना है।

पेसा कानून क्यों बनाया गया?

भारत के कई आदिवासी क्षेत्रों में पंचायत राज व्यवस्था वैसे लागू नहीं थी, जैसे सामान्य क्षेत्रों में।
इन क्षेत्रों में —

  • जल, जंगल, जमीन पर आदिवासी समुदाय की परंपरागत पकड़ रही
  • ग्रामसभा ही गाँव की मूल शासन इकाई थी
    लेकिन विकास परियोजनाओं, खनन, भूमि अधिग्रहण आदि के चलते उनके अधिकार प्रभावित होने लगे।
    इसलिए संविधान के पाँचवी अनुसूची क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने के लिए यह कानून लागू किया गया।

पेसा कानून की मुख्य बातें

पेसा ग्रामसभा को सर्वोच्च अधिकार देती है —
ग्रामसभा का मतलब: गाँव का हर वयस्क पुरुष और महिला

ग्रामसभा के प्रमुख अधिकार

1️⃣ जल, जंगल और जमीन पर नियंत्रण
2️⃣ खनन व अन्य परियोजनाओं की अनुमति देना/न देना
3️⃣ भूमि हस्तांतरण पर रोक या अनुमति
4️⃣ लघु वनोपज (महुआ, लाख, तेंदूपत्ता आदि) पर पूर्ण अधिकार
5️⃣ गाँव की सामाजिक व्यवस्था पर निर्णय —

  • पारंपरिक रीति-रिवाज
  • सामुदायिक न्याय
    6️⃣ शराब/नशा नियंत्रण संबंधी नियम ग्रामसभा तय करेगी
    7️⃣ विकास योजनाओं का चयन और निगरानी
    8️⃣ ग्राम संसाधनों की सुरक्षा और प्रबंधन

यह कानून कहता है: “आदिवासी अपने गाँव के मालिक हैं — किसी बाहरी को जबरन अधिकार नहीं।”

पेसा कानून का उद्देश्य

  • आदिवासी पहचान और अधिकारों की रक्षा
  • स्थानीय शासन को मजबूत बनाना
  • आर्थिक-सामाजिक शोषण रोकना
  • संसाधनों पर स्थानीय लोगों का स्वामित्व
  • विकास में उनकी सहभागिता सुनिश्चित करना

किन राज्यों में लागू है?

पाँचवी अनुसूची वाले 10 राज्यों में:

  • झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, ओडिशा, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और हिमाचल प्रदेश (कुछ क्षेत्र)

पेसा कानून: लाभ और व्यावहारिक चुनौतियाँ

पहलूलाभचुनौतियाँ
शासनग्रामसभा का मजबूत होनाप्रशासनिक हस्तक्षेप
संसाधनजल-जंगल-जमीन पर सुरक्षाअनुभव/तकनीकी कमी
आजीविकाआर्थिक सशक्तिकरणकॉरपोरेट टकराव
संस्कृतिपरंपराओं की रक्षाआधुनिकता बनाम परंपरा

पेसा कानून आदिवासी समुदाय के लिए — सम्मान, अधिकार और आत्मनिर्भरता का कानूनी कवच है। यदि इसे ईमानदारी से लागू किया जाए और ग्रामीणों को सही जागरूकता मिले, तो यह ग्रामीण स्वशासन और विकास का सबसे सशक्त मॉडल बन सकता है।

पेसा कानून के प्रमुख लाभ

1️⃣ जल, जंगल और जमीन पर अधिकार

पेसा कानून का सबसे महत्वपूर्ण लाभ है कि यह जल, जंगल और जमीन पर आदिवासी समुदाय की कानूनी मालिकाना और नियंत्रण की पुष्टि करता है। सदियों से आदिवासी समाज प्रकृति के बीच रहकर, उसके संसाधनों की रक्षा करता आया है। लेकिन बाहरी हस्तक्षेप, खनन, उद्योग और अवैध भूमि अधिग्रहण के कारण उनके अधिकारों पर लगातार खतरा बढ़ता गया। पेसा कानून के लागू होने के बाद ग्रामसभा को यह शक्ति मिलेगी कि वह अपने क्षेत्र में किसी भी भूमि हस्तांतरण या प्राकृतिक संपदा से संबंधित निर्णय पर अंतिम राय दे सके। अब न तो किसी व्यक्ति को जबरन भूमि छीनी जा सकेगी, न ही किसी कंपनी को बिना ग्रामसभा की अनुमति के जल-जंगल-जमीन का दोहन करने की इजाजत होगी। इस बदलाव से स्थानीय लोगों की सुरक्षा, आजीविका और पर्यावरण संरक्षण को मजबूती मिलेगी। यह कानून आदिवासी अस्तित्व, पहचान और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए अत्यंत प्रभावी साबित होगा।

2️⃣ ग्राम स्वशासन को मजबूती

पेसा कानून स्थानीय शासन प्रणाली को नई दिशा देता है, जिसमें ग्रामसभा सर्वोच्च निर्णय इकाई बन जाती है। गांव के विकास योजना, स्कूल, स्वास्थ्य, रास्ते, पानी आदि से जुड़े प्रोजेक्ट अब ग्रामीण स्वयं तय कर सकेंगे। भूमि अधिग्रहण, खनन और बड़े उद्योगों की स्वीकृति भी अब ग्रामसभा के अधिकार में होगी। इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था वास्तव में गांव तक पहुंचेगी और ग्रामीण विकास योजनाओं में स्थानीय जरूरतों और परंपराओं को प्राथमिकता मिलेगी। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और स्थानीय स्तर पर लिए गए फैसलों की जवाबदेही भी तय होगी। ग्राम स्वशासन की यह व्यवस्था लोगों में नेतृत्व क्षमता, भागीदारी और जिम्मेदारी की भावना को बढ़ाती है। अब गांव का भविष्य गांव ही तय करेगा, न कि बाहर बैठकर कोई अधिकारी या कंपनी। यह बदलाव ग्रामीणों को सीधे शासन का भागीदार बनाता है, जो आत्मनिर्भरता और सामाजिक सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम है।

3️⃣ सांस्कृतिक संरक्षण

पेसा कानून आदिवासी समुदाय की भाषा, कला, संस्कृति और पारंपरिक न्याय व्यवस्था को सम्मान और संरक्षण देता है। आदिवासियों की विशिष्ट जीवनशैली हमेशा प्रकृति से जुड़ी रही है और उनकी परंपराओं में सामूहिकता का भाव सर्वोपरि होता है। पेसा कानून के माध्यम से ग्रामसभा को यह अधिकार मिलता है कि वह अपने क्षेत्र में होने वाले सामाजिक व सांस्कृतिक निर्णयों को अपने पारंपरिक तरीकों से ही संचालित कर सके। गाँव में होने वाले विवाद, नशा नियंत्रण, विवाह और स्थानीय रीति-रिवाजों से जुड़े नियम भी ग्रामीण तय करेंगे। इस कानून से सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहेगी और बाहरी प्रभावों से उत्पन्न सामाजिक सामंजस्य की समस्या कम होगी। साथ ही, युवा पीढ़ी अपनी जड़ों के प्रति अधिक जागरूक होगी। कुल मिलाकर, पेसा कानून आदिवासी संस्कृति को समृद्ध और संरक्षित करने के साथ-साथ उनके मूल्यों को आधुनिक विकास के साथ जोड़ने का सेतु बनता है।

4️⃣ पारदर्शिता और स्थानीय विकास मॉडल

पेसा कानून विकास की उस अवधारणा को मजबूत करता है जिसमें निर्णय ग्राम की आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं के अनुरूप लिए जाते हैं। ग्रामसभा न केवल योजनाएं बनाएगी बल्कि उनके क्रियान्वयन और खर्च की निगरानी भी करेगी, जिससे भ्रष्टाचार और बाहरी राजनीति के हस्तक्षेप की संभावना कम होगी। जब स्थानीय स्तर पर ही योजना तैयार होगी तो गलत या लाभरहित परियोजनाओं का बोझ ग्रामीणों पर नहीं पड़ेगा। साथ ही, गांव के संसाधन गांव में ही उपयोग होंगे, जिससे सतत विकास को बढ़ावा मिलेगा। यह मॉडल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है और आर्थिक असमानता कम करने में सहायक होता है। स्थानीय पारदर्शिता और जवाबदेही की वजह से लोगों में सरकार और संस्थाओं पर भरोसा भी बढ़ेगा। संक्षेप में, पेसा कानून एक ऐसे विकास मॉडल को स्थापित करता है जो लोकतांत्रिक, न्यायपूर्ण और जमीनी हकीकत पर आधारित है।

5️⃣ रोजगार और आर्थिक सशक्तिकरण

पेसा कानून स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों पर ग्रामसभा के अधिकार को मान्यता देता है, जिससे कृषि, वनोपज, जल संसाधन और खनिज आधारित आजीविका के अधिक अवसर पैदा होंगे। लघु वनोपज जैसे — तेंदूपत्ता, महुआ, चिरौजी, लाख, शहद आदि पर ग्रामीणों का अधिकार होने से व्यापार में बिचौलियों का दखल कम होगा और किसानों को सीधा आर्थिक लाभ मिलेगा। खनन परियोजनाओं पर ग्रामसभा की अनुमति आवश्यक होने से ग्रामीणों को रोजगार, पुनर्वास और आर्थिक मुआवजा सुनिश्चित होगा। इसके अतिरिक्त स्वयं सहायता समूहों, हस्तशिल्प और छोटे उद्योगों को भी बढ़ावा मिलेगा। महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में यह कानून महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। कुल मिलाकर, यह कानून ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करके गरीबी कम करने और सम्मानजनक आजीविका उपलब्ध करने में बड़ा योगदान देगा।

6️⃣ पेसा कानून की चुनौतियाँ / नुकसान

यद्यपि पेसा कानून अत्यंत प्रभावी है, फिर भी इसके क्रियान्वयन में कई बाधाएँ सामने आती हैं। सबसे बड़ी चुनौती जागरूकता की कमी है — कई ग्रामीण अभी तक अपने अधिकारों से पूरी तरह परिचित नहीं हैं। प्रशासनिक ढांचे और स्थानीय राजनीति का दबाव भी निर्णयों को प्रभावित कर सकता है। कई क्षेत्रों में तकनीकी ज्ञान की कमी के कारण खनन, परियोजना प्रबंधन जैसे बड़े फैसलों में दिक्कतें आ सकती हैं। इसके अलावा, कॉरपोरेट और प्रशासनिक हितों के साथ संघर्ष भी आम है, क्योंकि संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण से अनेक बाहरी लाभार्थियों के मुनाफे पर असर पड़ता है। विवाद और कानूनी अड़चनें बढ़ सकती हैं। यदि सरकारी तंत्र समन्वय न करे तो कानून केवल कागजों में सीमित हो सकता है। इसलिए सफलता तभी संभव है जब ग्रामीणों को सही प्रशिक्षण, पारदर्शी व्यवस्था और प्रशासनिक सहयोग मिले। तभी पेसा कानून अपने वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त कर पाएगा।

जागरूकता की कमी

ग्रामसभाओं को अधिकार तो मिलेंगे, लेकिन यदि ग्रामीणों को कानून की सही जानकारी न हो, तो इसका लाभ सीमित हो सकता है।

प्रशासनिक और राजनीतिक हस्तक्षेप

स्थानीय स्तर पर दबाव समूहों, दलगत राजनीति और भ्रष्टाचार की वजह से निर्णय प्रभावित हो सकते हैं।

संसाधन प्रबंधन में अनुभव की कमी

खनन या भूमि प्रबंधन जैसे बड़े फैसलों में तकनीकी समझ की जरूरत होती है, जिसका अभाव हो सकता है।

बाहरी कॉरपोरेट हितों से टकराव

खनन और औद्योगिक परियोजनाओं में ग्रामसभा की अनुमति अनिवार्य होने से कंपनियों और प्रशासन के साथ संघर्ष की स्थिति बन सकती है।

पेसा कानून झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य के लिए आत्मनिर्भर और अधिकार-सम्मान आधारित शासन व्यवस्था की ओर एक ऐतिहासिक कदम है। हालांकि, इसकी सफलता जागरूकता, प्रशिक्षण, पारदर्शिता और प्रशासनिक सहयोग पर निर्भर करेगी। यदि ग्रामीण समुदाय अपने अधिकारों को समझकर लागू कर पाते हैं, तो पेसा कानून झारखंड में विकास और स्वशासन का नया अध्याय लिख सकता है।

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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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