श्योपुर (मध्यप्रदेश)। बाढ़ केवल पानी नहीं लाती। वह साथ लाती है डर, अनिश्चितता, और कभी-कभी ऐसे दृश्य जो ज़िंदगी भर आंखों से नहीं हटते। इस बार पार्वती नदी की बाढ़ ने मध्यप्रदेश के आमलदा गांव से एक ऐसी तस्वीर उकेरी है, जो न सिर्फ़ इंसानियत की गहराई को छूती है बल्कि यह पूछने पर मजबूर कर देती है — क्या अब प्रकृति की मार को भी न्याय की ज़रूरत है?
खेत में बिछी थी एक कहानी… मौत से भी बड़ी मोहब्बत की कहानी
जब सुबह की रोशनी में गांववालों ने आमलदा के एक खेत में दो लाशों को एक-दूसरे से लिपटा देखा — तो ज़मीन कांपी, दिल फटा, आंखें भीग गईं।
वो थे शिवम यादव और उनका 10 वर्षीय बेटा — राजू।
दो दिन पहले बाढ़ में लापता हुए ये दोनों पिता-पुत्र जब घर नहीं लौटे, तो परिजनों की बेचैनी किसी सज़ा से कम न थी। लेकिन जो दृश्य दो दिन बाद मिला, वह हर इंतज़ार से भारी था।
पिता और पुत्र की मृत देहों का आलिंगन — एक ऐसा आलिंगन जो बाढ़ की तेज़ धाराओं से लड़ते-लड़ते भी नहीं टूटा।
यह केवल मृत्यु नहीं थी… यह प्रेम का अंतिम प्रमाण था
कहते हैं कि एक बाप हर आफ़त से लड़ता है, अपनी औलाद को बचाने के लिए। और एक बच्चा, जब डरता है, तो सिर्फ़ अपने पिता की गोद में पनाह चाहता है।
पार्वती की बाढ़ ने जब इन दोनों को बहाने की कोशिश की, तो शिवम यादव ने अपने बेटे को अपनी छाती से चिपका लिया। शायद उन्हें यकीन था — जब तक मैं हूं, कुछ नहीं होगा।
और बेटे को भी बस एक यकीन था —
“पापा के साथ हूं, कुछ नहीं होगा।”
लेकिन प्रकृति ने दोनों को छीन लिया।
उनकी जिंदगियां बह गईं, पर वो तस्वीर रह गई — जो आज हर गांववाले की आंखों में कैद है।
प्रश्न — जो झकझोरते हैं आत्मा को, इस त्रासदी के बाद सवाल उठना लाज़मी है:
- क्या यह सिर्फ़ एक प्राकृतिक आपदा है?
- क्या यह प्रशासन की लापरवाही नहीं, जिसने समय रहते अलर्ट नहीं दिया?
- क्या यह सिस्टम का अपराध नहीं, जो जल-प्रबंधन से लेकर राहत इंतज़ामों तक हर मोर्चे पर फेल है?
- कौन न्याय देगा इस दृश्य को जिसने एक बाप और बेटे की अंतिम सांसों को एक साथ कैद कर लिया?
प्रकृति को तो कोई सज़ा नहीं देगा, लेकिन क्या हम अपनी नीतियों, अपनी संवेदनहीनता, अपनी तैयारियों को कभी कठघरे में खड़ा करेंगे?
यह लेख नहीं, एक प्रार्थना है…
ईश्वर से नहीं — समाज से, व्यवस्था से, प्रशासन से।
- कि अगली बार कोई बच्चा अपने पिता की छांव में मरने से पहले जी पाए।
- कि अगली बार कोई बाढ़ केवल पानी न लाए, मौत की कहानियां न बहाए।
- कि हम चेतें — जागें — और ऐसे मंजर दोहराए न जाएं।
श्रद्धांजलि
शिवम यादव और राजू यादव को। आप चले गए, लेकिन अपनी आखिरी झप्पी में इस दुनिया को इंसानियत का सबसे सच्चा चेहरा दिखा गए।
प्रकृति का प्रहार, प्रकृति को सज़ा कौन देगा, न्याय कौन करेगा? कौन सा प्रशासन, कौन सा जज इसका फ़ैसला करेगा? न्याय की माँग है, न्याय चाहिए। इनका हत्यारा कौन है?









